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इन्‍साफ़पसन्‍द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस्‍तीन का समर्थन क्‍यों करना चाहिए?

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इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस् ‍ तीन का समर्थन क् ‍ यों करना चाहिए ? आनन्‍द सिंह  हम इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों से मुख़ातिब हैं। जो लोग न् ‍ याय और अन् ‍ याय के बीच की लड़ाई में ताक़त के हिसाब से या समाज और मीडिया में प्रचलित धारणाओं के अुनसार आँखें और दिमाग़ बन्द करके अपना पक्ष चुनते हैं वे इस पोस् ‍ ट को न पढ़ें। आज हमसे हज़ारों मील दूर ग़ाज़ा में ज़ायनवादी इज़रायल इस सदी के सबसे बर्बर क़िस् ‍ म के जनसंहार को अंजाम दे रहा है। इस वीभत् ‍ स नरसंहार पर ख़ामोश रहकर या दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर हम इसे बढ़ावा देने का ही काम करेंगे। जो लोग इज़रायल और फ़िलिस् ‍ तीन के विवाद के इतिहास को ढंग से नहीं जानते वही लोग दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर दोनों से हिंसा छोड़ने का आग्रह करते हैं। अगर वे संज़ीदगी से इतिहास पढ़ें तो पायेंगे कि 1948 में इज़रायल नामक राष् ‍ ट्र का जन् ‍ म ही फ़िलिस् ‍ तीनियों की ज़मीन पर क़ब् ‍ ज़ा करके , उनको उनकी ही ज़मीन से बेदख़ल करके और बड़े पैमान पर क़त् ‍ लेआम को अंजाम देकर हुआ था। उसके बाद से क़ब् ‍ ज...

प्रेमचंद की कहानी - इस्तीफा

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  कहानी -  इस्तीफा    प्रेमचंद दफ्तर का बाबू एक बेजुबान जीव है। मजदूरों को आंखें दिखाओ तो वह त्यौरियां बदलकर खड़ा हो जायेगा। कुली को एक डांट बताओ , तो सिर से बोझ फेंककर अपनी राह लेगा। किसी भिखारी को दुत्कारो , तो तुम्हारी ओर गुस्से की निगाह से देखकर चला जायेगा। यहां तक कि गधा भी कभी-कभी तकलीफ पाकर दुलत्ती झाड़ने लगता है , मगर बेचारे दफ्तर के बाबू को आप चाहे आंखें दिखाएं , डांट बताएं , दुत्कारें या ठोकरें मारें , उसके माथे पर बल न आएगा। उसे अपने विकारों पर जो आधिपत्य होता है , वह शायद किसी संयमी साधु में भी न हो। संतोष का पुतला , सब्र की मूर्ति , सच्चा आज्ञाकारी , गरज , उसमें तमाम मानवी अच्छाईयां मौजूद होती हैं। खंडहर के भी एक दिन भाग्य जगते हैं। दीवाली के दिन उस पर भी रोशनी होती है , बरसात में उस पर हरियाली छाती है , प्रकृति की दिलचस्पियों में उसका भी हिस्सा है। मगर इस गरीब बाबू के नसीब कभी नहीं जागते। इसकी अंधेरी तकदीर में रोशनी का जलवा कभी नहीं दिखाई देता। इसके पीले चेहरे पर कभी मुस्कुराहट की रोशनी नजर नहीं आती। इसके लिए सूखा सावन है , कभी हरा भादों नहीं। ला...

कहानी - नौकर / सर्गेई सेमियोनोव Story - The Servant / Sergey Terentyevich Semyonov

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कहानी - नौकर सर्गेई सेमियोनोव  For English version please scroll down  लेखक परिचय - सर्गेई टेरेंटयेविच सेमियोनोव  ( 28 मार्च , 1868 - 3 दिसंबर , 1922) रूसी लेखक और मॉस्को साहित्यिक समूह सेरेडा के सदस्य थे। उनका जन्म मॉस्को गवर्नरेट के आंद्रेयेवस्कॉय गांव में हुआ था , जहां उनके माता-पिता किसान थे। गरीबी के कारण उन्होंने गाँव छोड़ दिया और एक व्यापारी , सेल्समैन , प्लम्बर , मजदूर और यहाँ तक कि एक अंधे व्यापारी के लिए मार्गदर्शक के रूप में भी काम किया। इन अनुभवों ने उन्हें अपने लेखन के लिए सामग्री दी। उनकी पहली कहानी टू ब्रदर्स ( 1887) की लियो टॉल्स्टॉय ने प्रशंसा की , समर्थन किया और उसे प्रोत्साहित किया। उनका पहला संग्रह , 1894 में क्रिस्टेन्स्की रस्साज़ी (किसान कहानियाँ) टॉल्स्टॉय की प्रस्तावना के साथ सामने आया , जिन्होंने लेखक के गद्य की प्रमुख विशेषताओं के रूप में "ईमानदारी , सार्थकता , सरलता और गंभीरता , साथ ही लोककथाओं की कल्पना से समृद्ध भाषा की अभिव्यक्ति" का हवाला दिया। उन्होंने कविता , कई नाटक , ट्वेंटी-फाइव इयर्स इन द विलेज नामक संस्मरणों की एक पुस्तक और निबंधों क...