देहात में गहराते महामारी के काले बादल
देहात में गहराते महामारी के काले बादल सत्यवीर सिंह पश्चिमी उत्तरप्रदेश का हमारा अमरोहा ज़िला गन्ने की खेती के लिए विख्यात है। लगभग सारी ज़मीन में गन्ना उगाया जाता है। गेहूं , धान , दलहन वगैरह जो दूसरी फसलें बोई जाती हैं उन्हें काटकर भी गन्ना ही बो दिया जाता है। सत्तर के दशक में जब गांव में रहना होता था तब प्रतिशत इतना नहीं था। आज खेतों में गया तो देखा , एक भी ईख के खेत में कोई बीमार पौधा नहीं है , सब एकदम झकास हरे भरे। भाई से इसका कारण पूछा तो पता चला कि अब गन्ने की खेती में रासायनिक खाद जितना ही खर्च कीटनाशकों- ख़तरनाक़ ज़हरीली दवाईयों का है जैसे कोराजेन ( Corazen), जिसकी क़ीमत ₹ 1800 की 100 ग्राम है जिसके छिड़काव से कोई भी कीट बच नहीं सकता , सालों तक ज़मीन में पैदा नहीं होता। ये जहर ज़मीन में मौजूद पानी में घुलता जा रहा है साल दर साल। दूसरी ओर बगैर सीवर लाइन के , शौचालयों का निर्माण जिससे मल सीधा ज़मीन के पानी में घुलता जा रहा है। पानी बिल्कुल पीने लायक़ नहीं बचा है। हमारे गाँव के लगभग आधे घरों में RO संयंत्र लगे हुए हैं। आर ओ के लिए बहता पानी चाहिए , मतलब छत पर टंकी चाहिए , मतलब बोर...