कहानी - हिरनौटा / मीत्री मामिन-सिबिर्याक
कहानी - हिरनौटा मीत्री मामिन-सिबिर्याक 1884 में लिखी गई कहानी ' हिरनौटा ' के लेखक मीत्री मामिन-सिबिर्याक का जन्म उराल में हुआ और यहीं उन्होंने जीवन के अधिकांश वर्ष बिताए। उराल पहाड़ों और जंगलों का इलाक़ा है , जहां 18 वीं सदी के आरम्भ में ज़ार प्योत्र प्रथम के ज़माने में रूसी सौदागरों ने लोहे के कारखाने बनाये थे। लेखक ने अपने संस्मरणों में लिखा था : “ अभी तक मेरी आंखों के आगे लकड़ी का वह पुराना घर है , जिसकी पांच खिड़कियां चौक पर खुलती थीं। उसकी खूबी यह थी कि एक ओर उसकी खिड़कियां यूरोप में खुलती थीं और दूसरी ओर – एशिया में। मेरे पिता मुझे दूर की पहाड़ियां दिखाते हुए बताया करते थे : ' वह देखो , वे पहाड़ एशिया में हैं , हम यूरोप और एशिया की सीमा रेखा पर रहते हैं... ’” लेखक के पिता एक कारखाने के पादरी थे और कोई खास अमीर आदमी नहीं थे , लेकिन उन्हें किताबों का बड़ा शौक़ था। वह अपनी आमदनी का बड़ा भाग किताबें खरीदने पर खर्च करते थे। बेटे को पिता से यह साहित्य-प्रेम विरासत में मिला। मामिन- सिबिर्याक उराल के सौदागरों , कारखानेदारों और आम लोगों के बारे में उपन्यास लिखते थे। उन द...