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कहानी - चारा काटने की मशीन / उपेन्द्रनाथ अश्क

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चारा काटने की मशीन उपेन्द्रनाथ अश्क रेल की लाइनों के पार, इस्लामाबाद की नयी आबादी के मुसलमान जब सामान का मोह छोड ,जान का मोह लेकर भागने लगे तो हमारे पड़ोसी लहनासिंह की पत्नी चेती। ''तुम हाथ पर हाथ धरे नामर्दों की भाँति बैठे रहोगे,'' सरदारनी ने कहा, ''और लोग एक से एक बढ़िया घर पर कब्जा कर लेंगे।'' सरदार लहनासिंह और चाहे जो सुन लें, परन्तु औरत जात के मुँह से 'नामर्द' सुनना उन्हें कभी गवारा न था। इसलिए उन्होंने अपनी ढीली पगड़ी को उतारकर फिर से जूड़े पर लपेटा; धरती पर लटकती हुई तहमद का किनारा कमर में खोंसा; कृपाण को म्यान से निकालकर उसकी धार का निरीक्षण करके उसे फिर म्यान में रखा और फिर इस्लामाबाद के किसी बढ़िया 'नये' मकान पर अधिकार जमाने के विचार से चल पड़े। वे अहाते ही में थे कि सरदारनी ने दौड़कर एक बड़ा-सा ताला उनके हाथ में दे दिया। ''मकान मिल गया तो उस पर अपना कब्जा कैसे जमाओगे?'' सरदार लहनासिंह ने एक हाथ में ताला लिया, दूसरा कृपाण पर रखा और लाइनें पार कर इस्लामाबाद की ओर बढ़े। खालसा कालेज रोड, अमृतसर पर, पुतली घर के समीप ही हमारी ...

उपेन्द्रनाथ अश्क की कहानी डाची

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उपेन्द्रनाथ अश्क की कहानी डाची   काट (काट - दस-बीस सिरकियों के खैमों का छोटा-सा गाँव) ' पी सिकंदर ' के मुसलमान जाट बाकर को अपने माल की ओर लालचभरी निगाहों से तकते देख कर चौधरी नंदू वृक्ष की छाँह में बैठे-बैठे अपनी ऊँची घरघराती आवाज में ललकार उठा , ' रे-रे अठे के करे है (अरे तू यहाँ क्या कर रहा है ?)?' - और उस की छह फुट लंबी सुगठित देह , जो वृक्ष के तने के साथ आराम कर रही थी , तन गई और बटन टूटे होने के कारण , मोटी खादी के कुर्ते से उसका विशाल वक्षस्थल और उसकी बलिष्ठ भुजाएँ दृष्टिगोचर हो उठीं। बाकर तनिक समीप आ गया। गर्द से भरी हुई छोटी-नुकीली दाढ़ी और शरअई मूँछों के ऊपर गढ़ों में धँसी हुई दो आँखों में निमिष मात्र के लिए चमक पैदा हुई और जरा मुस्करा कर उसने कहा , ' डाची (साँड़नी) देख रहा था चौधरी , कैसी खूबसूरत और जवान है , देख कर आँखों की भूख मिटती है। ' अपने माल की प्रशंसा सुन कर चौधरी नंदू का तनाव कुछ कम हुआ ; प्रसन्न हो कर बोला , ' किसी साँड़ (कौन-सी डाची) ?' ' वह , परली तरफ से चौथी। ' बाकर ने संकेत करते हुए कहा। ओकाँह (एक वृक्ष-व...