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रेबीज से कैसे बचें ?

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रेबीज से कैसे बचें ?  डॉ नवमीत कल की खबर है कि कबड्डी के एक राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी ने पानी में डूबते हुए एक पिल्ले को बचाया था। इस दौरान पिल्ले का दाँत उस खिलाड़ी की ऊँगली में लग गया। छोटी सी खरोंच थी तो जैसा कि सब करते हैं, उसने उसे इग्नोर कर दिया। कुछ दिन बाद उसे चोट की जगह सनसनाहट महसूस होने लगी। फिर सुन्नपना और फिर गले में रुकावट। पानी या कोई लिक्विड पीने पर गला पूरी तरह से चोक होने लगा और फिर लकवा आने लगा। अंततः उसकी मृत्यु हो गयी। यह क्लासिकल रेबीज का केस था। रेबीज का नाम आपने सुना ही होगा। यह उष्ण रक्त जानवरों के काटने से होने वाली एक बीमारी है जिसके होने पर मृत्यु की सम्भावना लगभग 100% है। भारत में हर साल 1 करोड़ 70 लाख लोगों को जानवरों (कुत्ते, बिल्ली, गीदड़, लोमड़ी, भेड़िया, चमगादड़ आदि) के द्वारा काटा जाता है और लगभग 18 से 20 हजार लोगों को रेबीज की बीमारी हो कर उनकी मृत्यु हो जाती है। इसमें सबसे ज्यादा अफ़सोसजनक बात ये है कि इन सभी मौतों को रोका जा सकता है लेकिन ये रुक नहीं पा रही हैं। इससे कैसे बचा जा सकता है? इसके लिये सबसे पहले हम रेबीज के बारे में थोड़ी सी बेसिक जानकारी हा...

एंटीबायोटिक दवाओं का गैर जरूरी इस्तेमाल

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  एंटीबायोटिक दवाओं का गैर जरूरी इस्तेमाल डॉ नवमीत भारत में मेडिकल प्रैक्टिस की सबसे बड़ी समस्या यूनिवर्सल हेल्थ केयर का न होना है। खैर यह तो जगजाहिर बात है। तो अगर कोई पूछे कि इसके बाद सबसे बड़ी समस्या क्या है ? तो शायद मेरा जवाब होगा.... एंटीबायोटिक दवाओं का गैर जरूरी इस्तेमाल। शायद इसलिए क्योंकि समस्याएं और भी हैं , लेकिन मुझे फिलहाल इसी पर लिखना है। किस बीमारी में एंटीबायोटिक दवाएं दी जानी चाहिए ? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि किस बीमारी के लिए एंटीबायोटिक दवाएं न दी जाएं। स्थिति यह है कि साधारण जुकाम और खांसी के लिए भी थर्ड जेनरेशन सेफ़लोस्पोरिन दवाओं के शॉट्स दिए जा रहे हैं। ये उच्च स्तर की एंटीबायोटिक दवाएं होती हैं जो गंभीर बैक्टीरियया जनित संक्रमण में ही दी जानी चाहिए , लेकिन खामखा चल रही हैं। एक जानकार महिला हैं। कुछ दिन पहले उन्हें बुखार, जुकाम और खांसी हुई। उन्होंने खुद से ही cefixime नामक एक एंटीबायोटिक लेनी शुरू कर दी। दो दिन दवा लेने के बाद आराम नहीं हुआ तो उनके पति ने उनको कहा कि यह हल्की एंटीबायोटिक है तुम Amoxicillin ले लो।...

गूगल डॉक्‍टर ना बनें, इलाज के लिए सही सलाह लें

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गूगल डॉक्‍टर ना बनें, इलाज के लिए सही सलाह लें डॉ नवमीत आजकल सभी लोगों को कोविड के इलाज में प्रयुक्त होने वाली दवाओं के नाम पता हैं। लोग फेसबुक पर भी जासूस/वैज्ञानिक का रोल प्ले करते हुए सवाल करते हैं कि इतनी महंगी 5000 रुपये की रेमडेसीवीर क्यों दी जा रही है और स्टेरॉयड जो कि 5 रुपये की सस्ती दवा है क्यों नहीं दी? क्या यह साजिश है? क्या इस साजिश की पटकथा सिकन्दर महान व चंगेज खान के समय से लिखी गई थी? आदि इत्यादि। तो ये दवाएं आखिर कब और क्यों देते हैं? क्यों किसी मरीज को एक दवा दी जाती है तो दूसरे मरीज को दूसरी? असल में कोविड 19 के इलाज के तीन मुख्य पहलू हैं। शुरुआती स्टेज मतलब पहले 10 दिन में वायरल लोड कम करना। इसके लिए एंटीवायरल दवाएं जैसे रेमडेसीवीर या फेवीपीरावीर दी जाती हैं। 10 दिन के बाद वाली कंप्लीकेशन्स को जैसे हाइपर एक्टिव इम्युनिटी को दबाने के लिए स्टेरॉइड्स जैसे हाइड्रोकॉर्टीसोन, डेक्सामेथासोन, मिथाइलप्रेडनीसोलोन या/और मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज जैसे टोसिलीज़ुमैब का प्रयोग करना और ब्लड क्लोटिंग को रोकने के लिए एन्टी कोएगुलेन्ट्स जैसे एस्पिरिन और हेपरिन। यही कोविड के इलाज का मेन स्टे...

क्या एक इंजेक्शन से बुखार/खांसी ठीक होता है?

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क्या एक इंजेक्शन से बुखार/खांसी ठीक होता है? डॉ. नवमीत डॉ साहब बुखार हुआ है। खांसी भी है। टीका (इंजेक्शन) लगा दो। इंजेक्शन की जरूरत नहीं है। न ही ऐसा कोई इंजेक्शन है जो एक डोज में बुखार खांसी को ठीक कर दे। लेकिन पिछली बार मैं तो फलाने डॉक्टर के पास गया था। उसने एक टीका लगाया था और मेरा बुखार बिलकुल ठीक हो गया। बिना टीका लगाए मुझे आराम होता ही नहीं। - इस तरह की बातचीत मेरे 10 साल के मेडिकल करियर के दौरान हजारों बार हुई है। मुझे आजतक ऐसी कोई दवा नहीं मिली है जो एक इंजेक्शन में बुखार ठीक कर दे। लेकिन मरीज और कुछ "डॉक्टर" तो बिलकुल दावा करते हैं कि वे एक ही "टीके" से बुखार ठीक कर देते हैं या उनका बुखार ठीक हो गया था। तो यह कैसे होता है? ज्यादातर बुखार के साथ खांसी जुकाम के केस वायरल इन्फेक्शन के होते हैं जो एक हफ्ते में खुद ब खुद ठीक हो जाता है। मरीज डॉक्टर के पास बुखार शुरू होने के 4-5 दिन बाद ही जाता है, तमाम घरेलू उपाय आजमाने के। वहां डॉक्टर "टीका" लगा देता है तो अगले दिन से यानि लक्षण शुरू होने के 6-7 दिन के बाद इन्फेक्शन वैसे ही खत्म हो चुका होता है। मरीज...

गिरोल्मो फ्राकस्टोरो और लुई पाश्चर - सच्‍चे वैज्ञानिक

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गिरोल्मो फ्राकस्टोरो और लुई पाश्चर - सच्‍चे वैज्ञानिक   डॉ. नवमीत  आज अधिकतर लोग जानते हैं कि संक्रामक रोग सूक्ष्म जीवों की वजह से होते हैं। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। किसी समय आम लोग ही नहीं बल्कि डॉक्टर भी इन रोगों का कारण खराब हवा या प्रदूषण को मानते थे। मलेरिया का तो नाम ही mal ( खराब) + aria ( हवा) इसलिए पड़ा था। सिर्फ मलेरिया ही नहीं बल्कि काली मौत के नाम से प्रसिद्ध प्लेग , हैजा , चेचक आदि तमाम बीमारियां खराब हवा की वजह से मानी जाती थी। यह तो पढेलिखे लोग मानते थे। अधिकतर लोग तो इसको ईश्वरीय प्रकोप ही समझते थे। बहरहाल ईश्वरीय प्रकोप की थ्योरी की ही तरह इसका भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। फिर 16 वीं सदी में इटली में एक डॉक्टर हुए। उनका नाम था गिरोल्मो फ्राकस्टोरो। वे एक डॉक्टर थे , एक कवि भी थे (ऐसा कम ही देखने को मिलता है)। साथ ही वे एक गणितज्ञ थे , भूगोलशास्त्री और खगोलशास्त्री भी थे। मतलब वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। 19 साल की उम्र में वह विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बन चुके थे। अपनी डॉक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान 1546 में उन्होंने कहा कि ये महामारियां हवा की ...

डेंगू के बारे में जानने के लिए ये पोस्‍ट जरूर पढ़ें / डॉ नवमीत

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डेंगू के बारे में चंद बातें डॉ नवमीत ( Doctors for Society के साथ जुड़े डॉक्‍टर) आजकल देश में डेंगू फैला हुआ है और हजारों लोग इसकी चपेट में हैं। कई लोगों की मृत्यु हो चुकी है और जनता में दहशत का माहौल है। तरह तरह की अफवाहें भी फैली हुई हैं। ऐसे में जरूरी है कि इस बीमारी के बारे में सही जानकारी जनता तक पहुंचे।   सबसे पहले हम बात करेंगे कि डेंगू आखिर है क्या और यह कैसे होता है ?  डेंगू एक संक्रामक रोग है जिसका संक्रमण एक मच्छर के काटने से होता है। इस मच्छर को एडीस एजिप्टी या टाइगर मस्किटो के नाम से जाना जाता है। टाइगर मच्छर इसलिए क्योंकि इस मच्छर के काले शरीर पर सफेद धारियां होती हैं। यह मच्छर दिन में काटता है। यह मच्छर अक्सर मानव आबादी के आसपास पानी के कृत्रिम स्रोतों और अन्य जगहों जैसे टिन , टूटी बोतलों , गमलों , नारियल के खोपों , मिट्टी के टूटे बर्तनों , पेड़ों के खोखले तनों , कूलरों , पानी की टँकी , पक्षियों के लिए रखे पानी के बर्तन आदि में इकट्ठे हुए साफ पानी में पनपता है। यह मच्छर लम्बी दूरी की उड़ान भी नहीं भरता। अपने स्रोत से अधिक से अधिक 100 मीटर से ज्...

परमाणु ऊर्जा और जादूगोडा का नरक

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परमाणु ऊर्जा और जादूगोडा का नरक  डॉ. नवमीत पिछले दिनों एक फ़िल्म आयी थी "परमाणु"। फ़िल्म में बड़े जोरशोर से राष्ट्रवाद का तड़का लगाते हुए दिखाया गया था कि किस तरह से भारत ने अमेरिका की नाक तले पोखरण में परमाणु विस्फोट किये थे। इसके बाद भारत एक नाभिकीय शक्ति के तौर पर स्थापित हो गया था। फिर उसी कड़ी में भारत सरकार ने आगे अमेरिका से न्यूक्लियर डील की और नाभिकीय ऊर्जा को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के तौर अपनाने की शुरुआत की।   खैर अब आपको लेकर चलते हैं झारखण्ड में सिंहभूम जिले के जादूगोड़ा कस्बे में। इस कस्बे और इसके आसपास के आदिवासी इलाकों में आपको जन्मजात और अनुवांशिक बीमारियों और अपंगता से ग्रस्त लोग बहुतायत से मिलेंगे। किसी की रीढ़ टेढ़ी हो गई है , किसी की मांसपेशियां काम नहीं करती , किसी को असाध्य कैंसर है। लेकिन इसका नाभिकीय ऊर्जा से क्या संबंध है ? असल में यह वह इलाका है जहां नाभिकीय ऊर्जा के लिए इस्तेमाल होने वाला उच्च कोटि का यूरेनियम पाया जाता है। यूरेनियम का यह समस्थानिक यानि आइसोटोप बहुत ज्यादा रेडियोएक्टिव होता है। इसके असुरक्षित खनन के चलते यहां की जनता पर इसक...