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इन्‍साफ़पसन्‍द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस्‍तीन का समर्थन क्‍यों करना चाहिए?

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इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस् ‍ तीन का समर्थन क् ‍ यों करना चाहिए ? आनन्‍द सिंह  हम इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों से मुख़ातिब हैं। जो लोग न् ‍ याय और अन् ‍ याय के बीच की लड़ाई में ताक़त के हिसाब से या समाज और मीडिया में प्रचलित धारणाओं के अुनसार आँखें और दिमाग़ बन्द करके अपना पक्ष चुनते हैं वे इस पोस् ‍ ट को न पढ़ें। आज हमसे हज़ारों मील दूर ग़ाज़ा में ज़ायनवादी इज़रायल इस सदी के सबसे बर्बर क़िस् ‍ म के जनसंहार को अंजाम दे रहा है। इस वीभत् ‍ स नरसंहार पर ख़ामोश रहकर या दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर हम इसे बढ़ावा देने का ही काम करेंगे। जो लोग इज़रायल और फ़िलिस् ‍ तीन के विवाद के इतिहास को ढंग से नहीं जानते वही लोग दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर दोनों से हिंसा छोड़ने का आग्रह करते हैं। अगर वे संज़ीदगी से इतिहास पढ़ें तो पायेंगे कि 1948 में इज़रायल नामक राष् ‍ ट्र का जन् ‍ म ही फ़िलिस् ‍ तीनियों की ज़मीन पर क़ब् ‍ ज़ा करके , उनको उनकी ही ज़मीन से बेदख़ल करके और बड़े पैमान पर क़त् ‍ लेआम को अंजाम देकर हुआ था। उसके बाद से क़ब् ‍ ज...

फ़‍िलिस्‍तीनी कवि तौफीक ज़ायद की कविता 'असम्भव' Poem “The Impossible” by Palestinian poet Tawfiq Zayyad

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 फ़‍िलिस्‍तीनी कवि तौफीक ज़ायद की कविता ' असम्भव ' For English version please scroll down  समुद्र को जोत दो तुम्हारे लिए यह काफ़ी आसान होगा कि एक सुई के छेद से हाथी निकाल लो या हवा में से भुनी हुई मछली पकड़ लो समुद्र को जोत दो या कछुए को आदमी बना लो पर , हमारे विश्वास की झिलमिलाती चमक को अत्याचारों से मिटा देना सम्भव नहीं है या हमारे बढ़ते क़दमों को रोक लेना एक भी क़दम को क्योंकि हम हज़ारों विलक्षण लोग हैं हर जगह फैल रहे हैं लिडा में , रमल्ला में , गैलिली में हम लोग यहाँ रहेंगे तुम्हारे सीने पर पत्थर की तरह और तुम्हारे गले में हम लोग अटक जायेंगे शीशे के एक टुकड़े की तरह कैक्टस के एक काँटे की तरह और तुम्हारी आँखों में आग की लपट की तरह हम लोग यहाँ रहेंगे हम लोग यहाँ रहेंगे तुम्हारे सीने पर पत्थर की तरह तुम्हारे शराबखानों में प्लेटें धोते तुम्हारे मालिकों के प्याले भरते तुम्हारी गन्दी रसोई साफ़ करते तुम्हारे नीले दाँतों के बीच से कौर छीनते अपने भूखे बच्चों के लिए हम लोग यहाँ रहेंगे तुम्हारे सीने पर पत्थर की तरह भूख सहते , चीथड़ों में लड़ते विरोध ...

ग़ाज़ा के एक बच्‍चे की कविता / कविता कृष्णपल्लवी

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ग़ाज़ा के एक बच्‍चे की कविता कविता कृष्णपल्लवी बाबा! मैं दौड़ नहीं पा रहा हूँ। ख़ून सनी मिट्टी से लथपथ मेरे जूते बहुत भारी हो गये हैं। मेरी आँखें अंधी होती जा रही हैं आसमान से बरसती आग की चकाचौंध से। बाबा! मेरे हाथ अभी पत्‍थर बहुत दूर तक नहीं फेंक पाते और मेरे पंख भी अभी बहुत छोटे हैं। बाबा! गलियों में बिखरे मलबे के बीच छुपम-छुपाई खेलते कहाँ चले गये मेरे तीनों भाई? और वे तीन छोटे-छोटे ताबूत उठाये दोस्‍तों और पड़ोसियों के साथ तुम कहाँ गये थे? मैं डर गया था बाबा कि तुम्‍हें पकड़ लिया गया होगा और कहीं किसी गुमनाम अँधेरी जगह में बन्‍द कर दिया गया होगा जैसा हुआ अहमद, माजिद और सफ़ी के अब्‍बाओं के साथ। मैं डर गया था बाबा कि मुझे तुम्‍हारे बिना ही जीना पड़ेगा जैसे मैं जीता हूँ अम्‍मी के बिना उनके दुपट्टे के दूध सने साये और लोरियों की यादों के साथ। मैं नहीं जानता बाबा कि वे लोग क्‍यों जला देते हैं जैतून के बागों को, नहीं जानता कि हमारी बस्तियों का मलबा हटाया क्‍यों नहीं गया अबतक और नये घर बनाये क्‍यों नहीं गये अबतक! बाबा! इस बहुत बड़ी दुनिया में बहुत सारे बच्‍चे होंगे हमारे ही जैसे और उनके भी व...

फ़िलिस्‍तीन और इज़रायल - न्‍याय और अन्‍याय के बीच की लड़ाई - आप किसके साथ ?

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  इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस् ‍ तीन का समर्थन क् ‍ यों करना चाहिए? आनन्‍द सिंह मैं इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों से मुख़ातिब हूँ। जो लोग न् ‍ याय और अन् ‍ याय के बीच की लड़ाई में ताक़त के हिसाब से या समाज और मीडिया में प्रचलित धारणाओं के अुनसार अपना पक्ष चुनते हैं वो इस पोस् ‍ ट को न पढ़ें। आज जब दुनियाभर में लोग कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं और हमारे देश में हुक् ‍ मरानों के निकम् ‍ मेपन की वजह से हम अपने देश के भीतर एक नरसंहार के गवाह बन रहे हैं, वहीं इस महामारी के बीच हज़ारों मील दूर ग़ाज़ा में ज़ायनवादी इज़रायल एक बार फिर मानवता के इतिहास के सबसे बर्बर क़िस् ‍ म के नरसंहार को अंजाम दे रहा है। इस वीभत् ‍ स नरसंहार पर ख़ामोश रहकर या दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर हम इसे बढ़ावा देने का काम करेंगे। जो लोग इज़रायल और फ़िलिस् ‍ तीन के विवाद के इतिहास को ढंग से नहीं जानते वही लोग दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर दोनों से हिंसा छोड़ने का आग्रह करते हैं। अगर वो संज़ीदगी से इतिहास पढ़ते तो पाते कि 1948 में इज़रायल नामक राष् ‍ ट्र का जन् ‍...

एक मामूली दुःख का रोजनामचा / महमूद दरवेश

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महमूद दरवेश : एक मामूली दुःख का रोजनामचा अनुवाद व संक्षिप् ‍ त परिचय ब् ‍ लॉगर मनोज पटेल "हर अच्छी कविता प्रतिरोध की एक कार्रवाही है." ऐसा मानने वाले फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश ने अपनी कविताओं जितना ही अच्छा गद्य भी लिखा है. इस आत्मकथात्मक किस्म के गद्य में उनकी नजरबंदी, इजरायली अधिकारियों की पूछताछ और जेल में बिताए उनके दिनों का ब्योरा है. यहाँ भी निर्वासन और अपनी मातृभूमि के लिए उनकी गहरी तड़प कदम-कदम पर दिखती है. उनका गद्य इतना काव्यात्मक है कि इसे उनकी कविताओं से अलगाना बेहद मुश्किल है. यहाँ प्रस्तुत अंश 'जर्नल आफ ऐन आर्डिनरी ग्रीफ' से... 1 -- तूफ़ान के गुजरने तक नीचे झुक जाओ मेरी जान. -- हमेशा के इस नीचे झुकने से मेरी पीठ धनुष हो गयी है. तुम अपना तीर कब चलाने जा रहे हो ? [ आप अपना हाथ दूसरे हाथ तक ले जाते हैं, और मुट्ठी भर आटा पाते हैं ] -- तूफ़ान के गुजरने तक नीचे झुक जाओ मेरी जान. -- हमेशा के इस नीचे झुकने से मेरी पीठ पुल हो गयी है. तुम पार कब उतरोगे ? [ आप अपना पैर बढ़ाने की कोशिश करते हैं, लेकिन लोहा हिलता भी नहीं ] -- तूफ़ान के गुजरने तक नीचे झुक जाओ...