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भीष्म साहनी की कहानी त्रास

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भीष्म साहनी की कहानी  त्रास ऐक्सिडेंट पलक मारते हो गया. और ऐक्सिडेंट की जमीन भी पलक मारते तैयार हुई. पर मैं गलत कह रहा हूँ. उसकी जमीन मेरे मन में वर्षों से तैयार हो रही थी. हाँ , जो कुछ हुआ वह जरूर पलक मारते हो गया. दिल्‍ली में प्रत्‍येक मोटर चलानेवाला आदमी साइकिल चलानेवालों से नफरत करता है. दिल्‍ली के हर आदमी के मस्तिष्‍क में घृणा पलती रहती है और एक-न-एक दिन किसी-न-किसी रूप में फट पड़ती है. दिल्ली की सड़कों पर सारे वक्‍त घृणा का व्‍यापार चलता रहता है. बसों में धक्‍के खाकर चढ़नेवाले , भाग-भगकर सड़कें लाँघनेवाले , भोंपू बजाती मोटरों में सफर करनेवाले सभी किसी-न-किसी पर चिल्‍लाते , गालियाँ बकते , मुड़-मुड़कर एक-दूसरे को दाँत दिखाते जाते हैं. घृणा एक धुंध की तरह सड़कों पर तैरती रहती है. पिछले जमाने की घृणा कितनी सरल हुआ करती थी , लगभग प्‍यार जैसी सरल. क्‍योंकि वह घृणा किसी व्‍यक्ति विशेष के प्रति हुआ करती थी. पर अनजान लोगों के प्रति यह अमूर्त घृणा , मस्तिष्‍क से जो निकल-निकलकर सारा वक्‍त वातावरण में अपना जहर घोलती रहती है. वह साइकिल पर था और मैं मोटर चला रहा था. न जाने वह आदमी ...

कहानी - गुलेलबाज़ लड़का / भीष्म साहनी

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गुलेलबाज़ लड़का भीष्म साहनी   छठीं कक्षा में पढ़ते समय मेरे तरह-तरह के सहपाठी थे. एक हरबंस नाम का लड़का था जिसके सब काम अनूठे हुआ करते थे. उसे जब सवाल समझ में नहीं आता तो स्याही की दवात उठाकर पी जाता. उसे किसी ने कह रखा था कि काली स्याही पीने से अक्ल तेज़ होती है. मास्टर जी गुस्सा होकर उस पर हाथ उठाते तो बेहद ऊंची आवाज़ में चिल्लाने लगता , “ मार डाला! मास्टर जी ने मार डाला!” वह इतनी ज़ोर से चिल्लाता कि आसपास की जमातों के उस्ताद बाहर निकल आते कि क्या हुआ है. मास्टर जी ठिठक कर हाथ पीछे कर लेते. यदि वह उसे पीटने लगते तो हरबंस सीधा उनसे चिपट जाता और ऊंची-ऊंची आवाज़ में कहने लगता , “ अब की माफ़ कर दो जी! आप बादशाह हो जी! आप अकबर महान हो जी! आप सम्राट अशोक हो जी! आप माई-बाप हो जी , मेरे दादा हो जी , परदादा हो जी!” क्लास में लड़के हंसने लगते और मास्टर जी झेंपकर उसे पीटना छोड़ देते. ऐसा था वह हरबंस. हर आए दिन बाग में से मेंढक पकड़ लाता और कहता कि हाथ पर मेंढक की चर्बी लगा लें तो मास्टर जी के बेंत का कोई असर नहीं होता , हाथ को पता ही नहीं चलता कि बेंत पड़ा है. एक दूसरा सहपाठी था...

भीष्‍म साहनी की कहानी - गंगो का जाया

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भीष्‍म साहनी की कहानी गंगो का जाया सामयिक हिन्‍दी साहित्‍य में (और ज्‍यादातर अन्‍य भाषाओं के साहित्‍य में भी) भारत का बहुसंख्‍यक मजदूर वर्ग गायब है, उसकी जिन्‍दगी का संघर्ष गायब है। साहित्‍य के साथ ही तीन दशक पहले ऐसी फिल्‍में भी दिखती थी जिनके नायक गरीब होते थे, मेहनतकश होते थे पर आज के साहित्‍य-सिने जगत की हालत हमें पता है। आज हम सुबह-सवेरे में पढ़ेंगे भीष्‍म साहनी की कहानी - गंगो का जाया जो वर्तमान दिल्‍ली को बसाने वाले मजदूरों की गाथा है। गंगो की जब नौकरी छूटी तो बरसात का पहला छींटा पड़ रहा था। पिछले तीन दिन से गहरे नीले बादलों के पुँज आकाश में करवटें ले रहे थे, जिनकी छाया में गरमी से अलसाई हुई पृथ्‍वी अपने पहले ठण्‍डे उच्‍छ्‌वास छोड़ रही थी, और शहर-भर के बच्‍चे-बूढ़े बरसात की पहली बारिश का नंगे बदन स्‍वागत करने के लिए उतावले हो रहे थे। यह दिन नौकरी से निकाले जाने का न था। मज़दूरी की नौकरी थी बेशक, पर बनी रहती, तो इसकी स्‍थिरता में गंगो भी बरसात के छींटे का शीतल स्‍पर्श ले लेती। पर हर शगुन के अपने चिन्‍ह होते हैं। गंगो ने बादलों की पहली गर्जन में ही जैसे अपने भाग्‍य की आव...