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कविता - नया लिबास पहनकर… / ग़ौहर रज़ा

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कविता - नया लिबास पहनकर…  ग़ौहर रज़ा  नया लिबास पहनकर के ये क्युं सोचते हो कि सारे ख़ून के धब्बों को तुम छुपा लोगे ? कि बस्तियों को जलाते रहे हो बरसों से उन्हीं की राख है अब तक तुम्हारे चेहरे पर सदाएं बच्चों की आती थीं जब अंधेरों में तुम्हारे पैर थिरकते थे रक्स करते थे घरों में सिसकियां आहें या आंसुओं की क़तार तुम्हारे दिल को सुकूं बख़्शती रहीं अब तक धरम शराब था बांटा गया , नशा भी हुआ और इस नशे में बहुत कुछ लुटा दिया तुमने हर एक फूल से रंगों से तुमको नफरत है न जाने कितना असासा जला दिया तुमने हर एक बाग में नफ़रत के बीज बोते रहे फसल खड़ी है अब तो काटने को आए हो फ़रेबो-झूठ की बैसाखियों पर चलते रहे तो पैर निकाले हैं जाने क्या होगा शहर शहर को जलाकर हमेशा तुमने कहा कि यही है मुल्क़ की ख़िदमत , यही वतन से है प्यार तुम्हारे क़दमों की आहट से दिल धड़कता था तुम्हारे बढ़ते क़दम अब भी वहशियाना हैं ये भूल जाएं और अब सब तुम्हारे साथ चलें तुम्हारे हाथों के ख़ंजर छिपे हुए तिरशूल चमकते भालों को भूलें तुम्हारे साथ चलें दहकते शोलों को भूल...

फासीवाद पर दो बेहद प्रासंगिक कविताएं Two relevant poems on fascism

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फासीवाद पर दो बेहद प्रासंगिक कविताएं 1. तुम्हें चुनना होगा (गौहर रजा)  जिन्होंने नफरत फैलाई , कत्ल किए और खुद खत्म हो गए , नफरत से याद किए जाते हैं। जिन्होंने मुहब्बत का सबक दिया और कदम बढ़ाए , वो जिंदा हैं , मुहब्बत से याद किए जाते हैं। जिन्होंने सही वक्त का इंतज़ार किया और शक करते रहे , वे आखिर तक हाथ पर हाथ धरे बैठे थे , शक के कमजोर किलों में क़ातिलों का इंतज़ार उनकी किस्मत बन गया। रास्ते अलग-अलग और साफ हैं। तुम्हें चुनना होगा नफरत , शक और मुहब्बत के बीच। तुम्हारी आवाज़ बुलंद और साफ होनी चाहिए , और कदम सही दिशा में। 2. एस.ए. *   सैनिक का गीत ( बेर्टोल्ट ब्रेष्ट) भूख से बेहाल मैं सो गया लिये पेट में दर्द। कि तभी सुनाई पड़ी आवाज़ें उठ , जर्मनी जाग! फिर दिखी लोगों की भीड़ मार्च करते हुएः थर्ड राइख़ **  की ओर , उन्हें कहते सुना मैंने। मैंने सोचा मेरे पास जीने को कुछ है नहीं तो मैं भी क्यों न चल दूँ इनके साथ। और मार्च करते हुए मेरे साथ था शामिल जो था उनमें सबसे मोटा और जब मैं चिल्लाया ‘र...