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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की असली जन्मकुण्डली और उसका असली एजेण्डा

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  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की असली जन्मकुण्डली  और उसका असली एजेण्डा सत्यम  लेख मूल रूप में ‘तज़किरा’ पत्रिका के अंक-3 (जून ’25) में प्रकाशित हुआ था। लेख के पीडीएफ़ का लिंक पिछले ग्यारह वर्षों के दौरान मोदी-शाह शासन के दौरान अनेक विचलित करने वाली घटनाओं ने हर इंसाफ़पसन्द इन्सान को परेशान किया है। समाज में साम्प्रदायिक नफ़रत और हिंसा इतनी व्यापक और इतने गहरे तक फैल गयी है कि पूरा सामाजिक ताना-बाना तार-तार हो गया है। ऐसे हमलों के ख़िलाफ़ बहुत से लोगों में आक्रोश भी है , लेकिन यह आक्रोश फ़ासीवाद के विरोध में असरदार और सुसंगत प्रतिरोध में तब्दील नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे एक वजह आम आबादी में आर.एस.एस.-भाजपा की पूरी राजनीति और फ़ासीवाद तथा उसकी कार्यप्रणाली की समझ का अभाव भी है। इस समय दुनिया के सबसे बड़े फ़ासिस्ट संगठन आर.एस.एस. का एक संक्षिप्त इतिहास आर.एस.एस. की ताक़त पिछले चार दशकों के दौरान बहुत तेज़ी से बढ़ी और यह राजनीति व समाज के हाशियों से छलाँग लगाकर सत्ता के गलियारों तक पहुँच गया , लेकिन इसकी शुरुआत आज से सौ साल पहले ही हो गयी थी। भारत में फ़ासीवाद का इतिहास...

कहानी - मुम्बई / एन.एस. माधवन Story - Mumbai / NS Madhavan

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कहानी -  मुम्बई एन.एस. माधवन ( अंग्रेज़ी से अनुवाद : सत्यम ) Please scroll down for  English version बचपन की यादें दुनिया को समझने में अज़ीज़ की मददगार थीं। बेशक़ , ऐसा सबके साथ होता होगा। दादा आदम को छोड़कर। धरती पर पहले इन्सान होने के नाते , उनका तो कोई बचपन भी नहीं था। (नाभि भी नहीं थी। हा , हा , हा , अज़ीज़ मन ही मन हँसा।) अज़ीज़ को बचपन की याद दिलाने वाली कोई भी चीज़ आसानी से पसन्द आ जाती थी। इसीलिए उसे मुम्बई पसन्द थी। अगर आप मट्टनचेरी को समतल कर दें , तो आपको मुम्बई मिल जाएगी। वार्डन रोड पर जिस फ्लैट में वह रहता था , उसके मालिक बुज़ुर्ग दम्पति भी उसे पसन्द थे। अगर शकूर साहब अपनी शानदार , सफ़ेद होती मूँछों और शरारती आँखों से एयर इंडिया महाराजा की याद दिलाते थे , तो अम्मीजान के गालों में पड़ने वाले बड़े-बड़े गड्ढों से उसे अपनी पसंदीदा अभिनेत्री , केपीएसी ललिता की याद आती थी। हमेशा की तरह उस दिन भी , सुबह-सुबह धुली हुई टैक्सियों को देखकर अज़ीज़ खुशी से भर गया। दूसरे शहरों की तरह मुम्बई की टैक्सियाँ भारी-भरकम एम्बेसडर नहीं थीं। वे फ़िएट थीं , बिल्कुल टैबी बिल्लियों ...