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मानवीय जीवन की सार्थकता के बाबत कुछ उद्धरण व कविताएं Some quotes and poems about the purpose of human life

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  मानवीय जीवन की सार्थकता के बाबत कुछ उद्धरण व कविताएं Some quotes and poems about the purpose of human life   आदमी की सबसे प्यारी चीज़ होती है उसकी ज़िन्दगी। उसे जीने के लिए बस एक ही ज़िन्दगी मिलती है, और उसे अपनी ज़िन्दगी को इस तरह जीना चाहिए ताकि उसे कभी इस पछतावे की आग में न जलना पड़े कि उसने अपने साल यूँ ही बर्बाद कर दिये, ताकि उसे एक क्षुद्र और तुच्छ अतीत को लेकर शर्मिन्दा न होना पड़े; उसे इस तरह जीना चाहिए ताकि जब वह मृत्युशैया पर हो, तो वह कह सके – मैंने अपनी सारी ज़िन्दगी, अपनी सारी ताक़त दुनिया के सबसे महान लक्ष्य के लिए, इन्सानियत की मुक्ति के लक्ष्य के लिए लगायी है। और इन्सान को अपनी ज़िन्दगी के एक-एक पल का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि कौन जाने कब अचानक कोई बीमारी या दुर्घटना उसके जीवन की डोर को बीच में ही काट दे। निकोलाई आस्त्रोवस्की Man's dearest possession is life. It is given to him but once, and he must live it so as to feel no torturing regrets for wasted years, never know the burning shame of a mean and petty past; so live that, dying, he might say: all my life, all...

भाषा के प्रश्न पर एक अनौपचारिक वार्ता

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भाषा के प्रश्न पर एक अनौपचारिक वार्ता शशि प्रकाश ( एक अनौपचारिक बातचीत का टेप किया गया अंश) भाषा का पतन दरअसल विचारों का पतन होता है। भाषाहीनता विचारहीनता की स्थिति होती है। उधार के विचार अनुवाद जैसी भाषा में प्रकट होते हैं। आडम्बरी लोगों की सजी-सँवरी भाषा भी बनावटी , खोखली और उबाऊ होती है। मौलिक विचार मौलिक भाषा में सामने आते हैं। यथार्थ के संधान और अन्वेषण में भटकते व्यक्ति की भाषा आभासी तौर पर अनगढ़ और भटकती हुई लगती है , पर फिर भी आकर्षक और आत्मीय प्रतीत होती है। सच्चा रचनाकार कभी अपनी अभिव्यक्ति से संतुष्ट नहीं होता। उसे कहीं कुछ अधूरा , कुछ छूट गया-सा महसूस होता रहता है। जो स्वाभाविक तौर पर अपनी भाषा में नहीं सोचते और नहीं लिखते , वे कभी भी न मौलिक चिन्तक हो सकते हैं और न ' जनता का आदमी ' । यह सही है कि यथासम्भव सरल भाषा में लिखना चाहिए , लेकिन सरलता का अतिरेकी आग्रह भाषा को अगर टकसाली और टपोरी बनाने तक चला जाए , तो यह समाज में विचारों की जगह को और अधिक संकुचित करता चला जायेगा। कोई दार्शनिक या वैचारिक बात यदि जटिल और अमूर्त है , तो लाख कोशिश के बावजूद भाषा में भी क...

कविता - सारी कथाएँ तो फिर भी नहीं कही जातीं / शशि प्रकाश

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कविता - सारी कथाएँ तो फिर भी नहीं कही जातीं शशि प्रकाश इतना अधिक आशावादी क्या होना कि निराशाएँ कभी पास फटकें ही नहीं और उदास हवाएँ आसपास से होकर गुज़रने से सहम जायें। आशा की ऐसी अलौकिक आभा लेकर भी कोई क्या करेगा कि कोई दुखी उदास हृदय ख़ुद को उसके सामने खोलकर रख देने में सकुचा जाये। जैसे कि इतना उबाऊ उल्लास लेकर भी भला क्या करेंगे कि अल्कोहल सने समवेत ठहाकों के बिना शामें सूनी-सूनी सी लगने लगें। * आशावादी भाषण तब सबसे अधिक खोखले और बनावटी लगते हैं जब कुछ न कहने की ज़रूरत हो , या हिचकता हुआ पास सरक आया हाथ महज़ एक स्पर्श की माँग कर रहा हो। गिरजाघर की वेदी पर जलती मोमबत्तियाँ जितनी भी जगमग करती हों , हर अगले दिन बुझी हुई मोमबत्तियों के झुण्ड से अधिक उदास करने वाले दृश्य बहुत कम होते हैं। *   जीवन और भविष्य का आशावादी सिनेमा पुदोव्किन के ' लिंकेज मोंताज ' की तरह नहीं , बल्कि आइजेंस्ताइन के ' कोलीज़न मोंताज ' की तरह होता है। लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं , उसमें ज़रूरी होते हैं बहुत सारे मौन अन्तराल और मद्धम गतियों के दृश्य एक विशाल भूदृश्य के बीच , विरुद्धों की एकता और टकराव को...

शशि प्रकाश की एक ताज़ा कविता : समंदर किनारे की एक रात

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शशि   प्रकाश   की   एक   ताज़ा   कविता  :  समंदर   किनारे   की   एक   रात   (5  अप्रैल , 2024) शशि प्रकाश की ' ताज़ा कविता ' की बेचैनी उन हज़ारों संघर्षरत नौजवानों और बुज़ुर्गों की ज़िन्दगी के उस गहन और सुंदरतम उत्स को समर्पित है , जो इस विज्ञान विरोधी और मनुष्य विरोधी दुष्काल से भी जूझते हुए अनवरत संघर्ष कर रहे हैं और एक असाधारण आशावाद से लबरेज़ होकर वे अपनी संवेदनात्मक ऊंचाई की सुरक्षा कर रहे हैं। समंदर की लहरें जो सिर पटकती हैं किनारे की अकेली चट्टान पर उनका पानी बदलता रहता है लेकिन नमक की मात्रा सबमें बराबर होती है। चट्टान अलग अलग वज़न और रफ़्तार की चोटें झेलती है। कुछ न कहती है। आसमान में तनहा है चाँद। बादल के आवारा टुकड़ों और यहाँ - वहाँ छिटके सितारों से नहीं है उसका कोई संवाद। चाँद के पास उदासी की पीली रोशनी है लेकिन आँसू का एक क़तरा भी नहीं। लहरों का नमक और पानी है ही नहीं उस अभागे के पास ...