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नज़्म - हाथों का तराना / अली सरदार जाफ़री

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नज़्म - हाथों का तराना अली सरदार जाफ़री (29 नवम्‍बर 1913 - 1 अगस्‍त 2000)  इन हाथों की ताज़ीम करो इन हाथों की तकरीम करो दुनिया के चलाने वाले हैं इन हाथों को तस्लीम करो तारीख़ के और मशीनों के पहियों की रवानी इन से है तहज़ीब की और तमद्दुन की भरपूर जवानी इन से है दुनिया का फ़साना इन से है , इंसाँ की कहानी इन से है इन हाथों की ताज़ीम करो सदियों से गुज़र कर आए हैं , ये नेक और बद को जानते हैं ये दोस्त हैं सारे आलम के , पर दुश्मन को पहचानते हैं ख़ुद शक्ति का अवतार हैं , ये कब ग़ैर की शक्ति मानते हैं इन हाथों को ताज़ीम करो एक ज़ख़्म हमारे हाथों के , ये फूल जो हैं गुल-दानों में सूखे हुए प्यासे चुल्लू थे , जो जाम हैं अब मय-ख़ानों में टूटी हुई सौ अंगड़ाइयों की मेहराबें हैं ऐवानों में इन हाथों की ताज़ीम करो राहों की सुनहरी रौशनियाँ , बिजली के जो फैले दामन में फ़ानूस हसीं ऐवानों के , जो रंग-ओ-नूर के ख़िर्मन में य...

देश की आज़ादी के मायने - क्रान्तिकारियों और कवियों-शायरों की नजर में

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देश   की   आज़ादी   के   मायने - क्रान्तिकारियों और कवियों-शायरों की नजर में  जालिम अंग्रेजों को मार भगाने वाले अनगिनत सेनानियों को क्रांतिकारी सलाम। भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, आजाद, बटुकेश्‍वर, बिस्मिल, अशफाक, ने जो सपना देखा था, वो आज भी अधुरा है। 1947 में आजादी तो मिली पर आधी-अधुरी। भगतसिंह ने उस समय ही चेतावनी दी थी कि भारतीय पूँजीपति वर्ग की प्रतिनिधि कांग्रेस के रास्‍ते मिलने वाली आजादी में बस यही होगा कि गोरे अंग्रेजों की जगह भूरे अंग्रेज आकर हमारी छाती पर काबिज हो जायेंगे। आजादी के इतने साल भी देश में व्‍याप्‍त गरीबी, बेरोजगारी, बदतर स्‍वास्‍थ्‍य सुविधायें, ऊपर की एक प्रतिशत अमीरजादों के पास देश की भारी सम्‍पदा का जमा होना, ये सब गवाही दे रहे हैं कि उस नौजवान की चेतावनी कितनी सही थी। आयें, उस जैसे अनगिनत शहीदों के सपनों को जानें और पूरा करने का संकल्‍प लें। शहीदों को सच्‍ची श्रद्धांजलि उनकी फोटो पर माला चढ़ाकर नहीं बल्कि उनके सपनों को पूरा कर ही दी जा सकती है। आज इस मौके पर हम आपके बीच क्रान्तिकारी शहीदों और आजाद भारत के कवियों-शायरों की ...