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इन्‍साफ़पसन्‍द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस्‍तीन का समर्थन क्‍यों करना चाहिए?

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इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस् ‍ तीन का समर्थन क् ‍ यों करना चाहिए ? आनन्‍द सिंह  हम इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों से मुख़ातिब हैं। जो लोग न् ‍ याय और अन् ‍ याय के बीच की लड़ाई में ताक़त के हिसाब से या समाज और मीडिया में प्रचलित धारणाओं के अुनसार आँखें और दिमाग़ बन्द करके अपना पक्ष चुनते हैं वे इस पोस् ‍ ट को न पढ़ें। आज हमसे हज़ारों मील दूर ग़ाज़ा में ज़ायनवादी इज़रायल इस सदी के सबसे बर्बर क़िस् ‍ म के जनसंहार को अंजाम दे रहा है। इस वीभत् ‍ स नरसंहार पर ख़ामोश रहकर या दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर हम इसे बढ़ावा देने का ही काम करेंगे। जो लोग इज़रायल और फ़िलिस् ‍ तीन के विवाद के इतिहास को ढंग से नहीं जानते वही लोग दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर दोनों से हिंसा छोड़ने का आग्रह करते हैं। अगर वे संज़ीदगी से इतिहास पढ़ें तो पायेंगे कि 1948 में इज़रायल नामक राष् ‍ ट्र का जन् ‍ म ही फ़िलिस् ‍ तीनियों की ज़मीन पर क़ब् ‍ ज़ा करके , उनको उनकी ही ज़मीन से बेदख़ल करके और बड़े पैमान पर क़त् ‍ लेआम को अंजाम देकर हुआ था। उसके बाद से क़ब् ‍ ज...

बिटकॉइन और क्रिप्‍टोकरेंसी: संकटग्रस्‍त पूँजीवाद के भीतर लोभ-लालच, सट्टेबाज़ी और अपराध को बढ़ावा देने के नये औजार

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  बिटकॉइन और क्रिप्‍टोकरेंसी: संकटग्रस्‍त पूँजीवाद के भीतर लोभ-लालच, सट्टेबाज़ी और अपराध को बढ़ावा देने के नये औजार आनन्‍द सिंह  हाल के वर्षों में भारत सहित दुनिया के कई हिस्‍सों में खाते-पीते लोगों के बीच बिटकॉइन और अन्‍य क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करके पैसे से पैसा बनाने की एक नयी सनक पैदा हुई है। इस सनक को बढ़ावा देने का काम इण्‍टरनेट, सोशल मीडिया और मुख्‍यधारा की मीडिया पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनों ने किया है जिनमें  लोगों को बिना मेहनत किये रातों-रात अमीर बन जाने के सब्‍ज़बाग़ दिखाये जाते हैं। इन विज्ञापनों में लोगों को बताया जाता है कि क्रिप्‍टोकरेंसी में निवेश करके वे बैंक और शेयर बाज़ार में किये गये निवेश के मुक़ाबले कई गुना ज्‍़यादा पैसा बना सकते हैं। ऐसे में ताज्‍जुब की बात नहीं है कि हाल के वर्षों में दुनिया के तमाम देशों की ही तरह भारत के खाते-पीते लोगों ने इस देश के मज़दूरों के निर्मम शोषण से जमा की गयी पूँजी को क्रिप्‍टोकरेंसी में जमकर निवेश किया है। इस प्रक्रिया में कुछ लोगों ने ख़ूब पैसे कमाये भी हैं जिसकी वजह से अन्‍य लोगों को यह उम्‍मीद रहती है कि उनके...

‘जय भीम’ फिल्‍म की समीक्षा Review of Film 'Jai Bheem'

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 ‘जय भीम’: उत्पीड़ितों के ख़ून में डूबी व्‍यवस्‍था की न्‍यायप्रियता स्‍थापित करने वाली फ़‍िल्‍म आनन्‍द सिंह  For English version please scroll down  तमिल फ़‍िल्‍म ‘जय भीम’ को देखकर भॉंति-भॉंति के उदारवादी, अस्‍मितावादी व सामाजिक जनवादी समीक्षक और बुद्धिजीवी लोटपोट हुए जा रहे हैं। आज के फ़‍ासिस्‍ट दौर में जब भारत के पूँजीवादी लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका ही नहीं बल्कि न्‍यायपालिका सहित व्‍यवस्‍था की सभी संस्‍थाएँ पूँजी और सत्‍ता के इशारे पर जनता की छाती पर मौत का ताण्‍डव कर रही हैं और जब इस व्‍यवस्‍था का क्रूर जनविरोधी चेहरा दिन के उजाले के समान सबके सामने आ चुका है, ‘जय भीम’ जैसी फ़‍िल्‍में हमारे समीक्षकों और बुद्धिजीवियों को दलितों-आदिवासियों-अल्‍पसंख्‍ यकों-शोषितों-उत्पीड़ितों के ख़ून से लथपथ व्‍यवस्‍था की न्‍यायप्रियता पर भरोसा बनाये रखने का एक कारण देती हैं। ऐसी फ़‍िल्‍में देखकर उनका यह यक़ीन पुख्‍़ता हो जाता है कि दरअसल दोष इस व्‍यवस्‍था का नहीं है बल्कि कुछ लोगों का है जो अपनी ताक़त का दुरुपयोग करके कमज़ोर तबकों पर ज़ुल्‍म ढाते हैं। इसलिए फ़‍िल्‍म देखकर वे आ...

फ़िलिस्‍तीन और इज़रायल - न्‍याय और अन्‍याय के बीच की लड़ाई - आप किसके साथ ?

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  इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस् ‍ तीन का समर्थन क् ‍ यों करना चाहिए? आनन्‍द सिंह मैं इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों से मुख़ातिब हूँ। जो लोग न् ‍ याय और अन् ‍ याय के बीच की लड़ाई में ताक़त के हिसाब से या समाज और मीडिया में प्रचलित धारणाओं के अुनसार अपना पक्ष चुनते हैं वो इस पोस् ‍ ट को न पढ़ें। आज जब दुनियाभर में लोग कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं और हमारे देश में हुक् ‍ मरानों के निकम् ‍ मेपन की वजह से हम अपने देश के भीतर एक नरसंहार के गवाह बन रहे हैं, वहीं इस महामारी के बीच हज़ारों मील दूर ग़ाज़ा में ज़ायनवादी इज़रायल एक बार फिर मानवता के इतिहास के सबसे बर्बर क़िस् ‍ म के नरसंहार को अंजाम दे रहा है। इस वीभत् ‍ स नरसंहार पर ख़ामोश रहकर या दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर हम इसे बढ़ावा देने का काम करेंगे। जो लोग इज़रायल और फ़िलिस् ‍ तीन के विवाद के इतिहास को ढंग से नहीं जानते वही लोग दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर दोनों से हिंसा छोड़ने का आग्रह करते हैं। अगर वो संज़ीदगी से इतिहास पढ़ते तो पाते कि 1948 में इज़रायल नामक राष् ‍ ट्र का जन् ‍...

अगर आप बच्‍चों से प्‍यार करते हैं तो आपको.........

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अगर आप बच्‍चों से प्‍यार करते हैं तो आपको क्रान्ति के बारे में गम्‍भीरता से सोचना चाहिए आनन्‍द सिंह वैसे तो समाज में बढ़ती अमीर-ग़रीब के बीच की खाई , भुखमरी , कुपोषण , पर्यावरण विनाश और लोगों की आज़ादी पर तमाम किस्‍म की पाबन्दियाँ किसी भी संवेदनशील और न्‍यायप्रिय व्‍यक्ति के लिए मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढाँचे के क्रान्तिकारी बदलाव के बारे में सोचने की वजह होनी चाहिए , परन्‍तु यदि आपने खुद को क्रान्तिकारी बदलाव के संघर्षों से काटकर अपने परिवार की जिम्‍मेदारियों का निर्वहन करने तक इसलिए सीमित कर लिया है क्‍योंकि आपको क्रान्तिकारी बदलाव गैर-ज़रूरी या अव्‍यावहारिक लगता है तो यह नोट ज़रूर पढ़ें क्‍योंकि मुमकिन है कि इसे पढ़ने के बाद आप क्रान्ति के बारे में गम्‍भीरता से सोचने लग जाएँ। मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि हमारे समाज में तेज़ी से बह रही नफ़रत , मतलबपरस्‍ती , और हृदयहीनता की गरम हवा ने आपके व्‍यक्तित्‍व को इतना रूखा नहीं बना दिया है कि आप बच्‍चों से प्‍यार करना भूल चुके हैं। दूसरों के बच्‍चों से नहीं तो कम से कम अपने घर के बच्‍चों से तो प्‍यार करते ही होंगे। यह तो सच है कि आ...