नोदर दुम्बाद्जे के उपन्‍यास 'आशा की किरण' की पीडीएफ फाइल

नोदर दुम्बाद्जे के उपन्‍यास 'आशा की किरण' की पीडीएफ फाइल

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पुस्‍तक का संक्षिप्‍त परिचय


नोदर दुम्बाद्जे की “आशा की किरण” युवावस्था, प्रेम तथा मित्रता के बारे में लिखी गयी पुस्तक है। पाठकों के समक्ष दूरस्थ जॉर्जियाई गांव से आये इस लघु-उपन्यास के पात्रों के पास कहने को बहुत कुछ है। वे उस विपत्ति का कड़वा स्वाद जानते हैं, जो एक बार उनके घर पर ढह पड़ी थी। वे विजय के आनंद का स्वाद भी जानते हैं। और उनके लिए सूरज को देख पाने का सुख सचमुच स्वतंत्र धरती पर स्वतंत्रतापूर्वक सांस लेने का सुख है। 

नो. दुम्बाद्जे के प्रमुख पात्र युद्धोत्तर काल के नौजवान हैं। जुरिको तथा सोसो “आशा की किरण” उपन्यास के नायक हैं। उनका पालन-पोषण महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध (सन 1941–1945) के काल में हुआ। जुरिकेला गरिया के सर्वाधिक सुन्दर व ज़िन्दादिल गांव गुवाज़ोली में रहता है। वह अपने गांव को प्यार करता है, क्योंकि वहां वह अपनी दादी के साथ रहता है, वहां इलिको, इलारियोन और उसका नन्हा कुत्ता मुरादा भी रहते हैं।

रणभूमि से दूर स्थित इस गांव पर युद्ध के बादल मंडराने लगे। युद्ध के योग्य सभी मर्द मोर्चे पर चले गये। सारा गांव अव्यवस्थित होकर जी रहा था। लोगों के पास जो कुछ था, वह सब उन्होंने मोर्चे की सहायता के लिए दे दिया। इलिको ने अपना आख़िरी लबादा दे दिया, इलारियोन ने लबादे के पास अपने एकमात्र बूट रख दिये। रात को जब जुरिको की नींद खुली, वह देर तक मौन लेटा दादी की ओर देखता रहा, और उसकी आंखें डबडबा आयीं। वह उस अपरिचित सैनिक के बारे में सोच रहा था, जिसके लिए दादी कड़क की सर्दी में ठिठुरते हाथों से गर्म मोज़े बुन रही थी।

आशा की किरण अतिगीति‍मय कृति है। वह मनुष्य में विश्वास, भलाई में विश्वास से ओत-प्रोत है।



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