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संघियों के असली गुरु हिटलर और मुसोलिनी हैं

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संघियों के असली गुरु हिटलर और मुसोलिनी हैं भारतीय फासीवादी संगठन यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने आप को सबसे ज्यादा देशभक्त दिखाने की कोशिश करता है क्योंकि हमें पता है कि जो गद्दार होता है वह हमेशा ही ज्यादा शोर मचाता है ताकि उसकी गद्दारी छुपी रहे। 1947 से पहले का इनका इतिहास और उसके बाद का भी इतिहास इस चीज का गवाह है कि इन्हें देश की व्यापक जनता के हितों से कुछ लेना-देना नहीं है बल्कि शासक वर्गों के साथ मिलकर आम जनता को आपस में लड़ा कर ही इन का उल्लू सीधा होता है। कहने को तो यह अपने आप को पूरी तरह देशी बताते हैं लेकिन इनकी विचारधारा हिटलर, मुसोलिनी से आती है। इसके बारे में हम कई बार विस्तृत लेख व पुस्तकें भेज चुके हैं। आज हम एक महत्वपूर्ण कार्टून आपके बीच लेकर आए हैं। इस कार्टून को तन् ‍ मय त् ‍ यागी ने बनाया है। इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचायें। आज भले ही इन लोगों की तादाद समाज में ज्यादा हो लेकिन कायर और दंगाई लोग कभी भी समाज में वह स्थान नहीं पा सकते जो सच्चे क्रांतिकारी और आम जनता के हितों के रक्षक लोग पाते हैं। समय जरूर बदलेगा और इन सब फासीवादियों को उनके किए की सजा ...

सेर्गेई मिखाल्कोव की दो छोटी कहानियां

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सेर्गेई मिखाल्कोव की दो छोटी कहानियां 1.  गधा और ऊदबिलाव एक बार की बात है ,  जंगल के बीचोबीच गलियारे में एक बहुत प्यारा नन्हा पेड़ था। एक दिन एक गधा दौड़ता हुआ उस जंगली रास्ते पर आया ;  लेकिन जब वह दूसरी ओर देख रहा था ,  उसी समय पेड़ से टकरा गया ;  और उसे इतनी तेज चोट लगी कि दिन में तारे नजर आने लगे। गधे को बहुत गुस्सा आया। वह नदी की ओर गया और बाहर से ऊदबिलाव को ,  जिसे वह पहले से जानता था ,  पुकारने लगा- “ मैं पूछता हूँ ,  ऊदबिलाव! क्या तुम जंगल की उस जगह को जानते हो ,  जिसके बीचोबीच एक पेड़ लगा हुआ है। ” “ हाँ – हाँ ,  मैं जानता हूँ! ” “ तो तुम मेरा एक काम कर दो-जाओ और उस पेड़ को गिरा दो-तुम्हारे पास तो बहुत नुकीले दाँत हैं। ” “ लेकिन तुम इस धरती पर किसलिए हो ?” “ मेरा सिर उससे टकरा गया ,  देखो यह गूमड़-कितना बड़ा – सा है ?” “ तुम्हारी नजरें कहाँ थीं ?” “ कहाँ ?  कहाँ थी मतलब ?  मैं दूसरी ओर देख रहा था! मेहरबानी करके जाओ और पेड़ को काट डालो! ” “ मैं ऐसा नहीं कर सकता। जंगली रास्ते में वह बह...

नए खुशहाल मध्यवर्ग का विश्वासघात

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नए खुशहाल मध्यवर्ग का विश्वासघात   कात्यायनी पिछली शताब्दी के अंतिम दशक से नव उदारवाद की भूमंडलीय व्याप्ति का जो नया ऐतिहासिक दौर शुरू हुआ है , तबसे शब्दों के सुनिश्चित अर्थों और ऐतिहासिक निहितार्थों का , स्मृतियों , स्वप्नों और कल्पनाओं की सर्जनात्मक ऊर्जस्विता का , बाजार की कृत्या ने पण्य-पूजा (कमोडिटी-फेटिशिज्म) के जादुई अनुष्ठान द्वारा अपहरण कर लिया है। यूं तो भारतीय सामाजिक जीवन में ह्रासमान , मानवद्रोही पूंजीवादी मूल्यों की मद्धम गति से , हवा में नामालूम तरीके से घुलते जहर जैसी पैठ गत आधी शताब्दी से जारी थी। पुरानी बर्बरताओं के साथ नई बर्बरताओं की कुटिल दुरभिसंधि का दस्तावेज तो अरसे पहले लिखा जा चुका था। लेकिन समाजवादी प्रयोगों के प्रथम चक्र की विफलता और पूंजी के भूमंडलीकरण के नए साम्राज्यवादी दौर ने हमारे समय में भविष्य-स्वप्नों पर राख-अंधेरे की बारिश-सी कर दी है। पूंजीतंत्र के देसी-विदेशी थिंक टैंकों ने नए संचार-माध्यमों के सहारे वैचारिक-सांस्कृतिक वर्चस्व की एक नई कुटिल परियोजना तैयार की है जिसे लागू करने में जमीर और ईमान की बोली लगा चुके गंजी चमकती आत्माओं वा...

केदारनाथ अग्रवाल की आठ कविताएँ

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केदारनाथ अग्रवाल की आठ कविताएँ ( एक) जीवन की धूल जो जीवन की धूल चाटकर बड़ा हुआ है , तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है , जिसने सोने को खोदा , लोहा मोड़ा है , जो रवि के रथ का घोड़ा है , वह जन मारे नहीं मरेगा , नहीं मरेगा। जो जीवन की आग जलाकर आग बना है फ़ौलादी पंजे फैलाये नाग बना है जिसने शोषण को तोड़ा , शासन मोड़ा है , जो युग के रथ का घोड़ा है वह जन मारे नहीं मरेगा , नहीं मरेगा।। ________________________ ( दो) आग लगे इस रामराज में आग लगे इस रामराज में ढोलक मढ़ती है अमीर की चमड़ी बजती है ग़रीब की ख़ून बहा है रामराज में आग लगे इस रामराज में आग लगे इस रामराज में रोटी रूठी , कौर छिना है थाली सूनी , अन्न बिना है पेट धँसा है रामराज में आग लगे इस रामराज में। १८ सितम्बर १९५१   ________________________   ( तीन) मजदूर का जन्म   एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ! हाथी सा बलवान , जहाज़ी हाथों वाला और हुआ! सूरज-सा इंसान , तरेरी आँखों वाला और हुआ!! एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ! मात...

कुछ बेतरतीब उद्धरण, कविताएं

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कुछ बेतरतीब उद्धरण, कविताएं  सरकार लोगों को विश्वास दिलाती है कि उनपर दूसरे राष्ट्र द्वारा हमले का खतरा मंडरा रहा है , या उनके बीच मौजूद दुश्मनों से उन्हें खतरा है , और इस खतरे से बचने का एकमात्र रास्ता यह है कि लोग गुलामों की तरह अपनी सरकार का आज्ञापालन करें। ✍   लेव तोल्स्तोय ________________________ जिन लोगों को हम प्यार करते हैं उनके प्यार को महसूस करना वह आग है जो हमारी ज़िन्दगी को ख़ुराक देती है। ✍   पाब्लो नेरूदा ________________________ अगर तुम सिर्फ़ तभी ऊँचे क़द के लगते हो क्योंकि कोई अपने घुटनों के बल खड़ा है , तो तुम्हारी समस्या गंभीर है। ✍   टोनी मॉरिसन ________________________ जब तक मैं जीवित हूं , जीवन का शासक रहूंगा , गुलाम नहीं , एक शक्तिशाली विजेता की तरह उससे मुलाक़ात करूंगा , और मुझसे बाहरी कोई भी चीज़ कभी मुझ पर काबू नहीं कर पायेगी - वाल्‍ट व्हिटमैन ________________________ '' आदमी सचेतन रूप से अपने लिए जीता है परन्‍तु अवचेतन मन से वह मानवजाति के ऐतिहासिक , सर्वव्‍यापी लक्ष्‍य सिद्धी का साधन बनता है .. '' ✍ लेव तोल...

कविता - फसल / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

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कविता - फसल सर्वेश्वरदयाल सक्सेना हल की तरह कुदाल की तरह या खुरपी की तरह पकड़ भी लूं कलम तो फिर भी फसल काटने मिलेगी नहीं हम को। हम तो ज़मीन ही तैयार कर पाएंगे क्रांतिबीज बोने कुछ बिरले ही आएंगे हरा-भरा वही करेंगें मेरे श्रम को सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को। कल जो भी फसल उगेगी , लहलहाएगी मेरे ना रहने पर भी हवा से इठलाएगी तब मेरी आत्मा सुनहरी धूप बन बरसेगी जिन्होंने बीज बोए थे उन्हीं के चरण परसेगी काटेंगे उसे जो फिर वो ही उसे बोएंगे हम तो कहीं धरती के नीचे दबे सोएंगे।