Posts

कविता - मनुष्‍य / एदुअर्द्स मीज़ेलाइतिस

Image
लिथुआनिया की कविता - मनुष्‍य एदुअर्द्स मीज़ेलाइतिस धरती के गोले पर टिके हैं दो पैर। मेरे दो हाथ बढ़ते हैं सूर्य के घेरे की ओर। धरती के गोले और सूर्य के घेरे के बीच यूँ खड़ा हूँ मैं... गोल है मेरा सिर -- धरती के गोले की तरह -- जिसके भीतर -- कोयले और खनिज की परतों के भांति -- स्थित है मेरा मस्तिष् ‍ क जो कोई कम मूल् ‍ यवान नहीं है। मैं खोदता हूँ इसे और ढालता हूँ लोहे के औजार और सभी तरह की भीमकाय मशीनें: रेलें जोड़ती सुदूर देशों को एक साथ , जलयान हर मौसम में जोतते हुए समुद्र , वायुयान परिन् ‍ दों को शर्माती जिनकी उड़ान , राकेट लगभग द्रुत ज् ‍ यों प्रकाश और शीघ्रगामी ज् ‍ यों मेरे विचारों की उड़ान.... गोल है मेरा सिर -- सूर्य के घेरे की तरह -- जिसके भीतर से फूटती हैं बहती हुई सभी ओर , चारों दिशाओं में अनवरत चमत् ‍ कारी किरणें : वे धरती पर संजोती हैं , पोसती हैं जीवन वहाँ सतत् जन् ‍ म को बढ़ावा देती है ... यह धरती क् ‍ या है ? क् ‍ या ...

कविता - मज़दूरों की आँखों ने / सनी सिंह

Image
कविता - मज़दूरों की आँखों ने / सनी सिंह  सनी सिंह एक मजदूर कार्यकर्ता हैं और दिल्‍ली के स्‍टील मजदूरों के बीच काम करते हैं। कल तक जो धधक रहा था , वह बारिश के पानी में बुझ गया है , राख और अँगारे फैक्टरियों के नालों में बह गए , हर ओर धुआँ है बस इस धुएँ में दम घुटता है , आँखें जलती हैं , नज़र आती हैं अभी भी सभी ओर दैत्याकार फैक्टरियां , रास्तों में सन्नाटा भरा है , उस तरह ही जैसे स्टील की पट्टी से हाथ लगे चीरे के घाव में भरा हो मवाद , बस बारिश के पानी की आवाज़ , नालों में बहते पानी की आवाज़ आती है , फैक्टरियों का शोर आदत बन चुका है , रास्तों के कुछ कोनों पर लोग दीवारों की ओर मुहँ किये खड़े हैं , शांत , भीगते हुए , पर आँखों में गुस्सा है , भीषण गुस्सा। जैसे नाटक के पात्र फ्रीज़ हुए खड़े हों , ताप जो भीषण धधकती आग में पैदा हुआ वह ज़िंदा है अभी पर अभिव्यक्त नहीं होता उन शांत मुद्राओं में , खड़े रहना महज वक़्त काटना नहीं है , यह इंतज़ार है बारिश के थमने का , अपने सीनों के रिस्ते ज़ख्मों के भरने का , उमस हर ओर है , बारिश त...

अगर आप बच्‍चों से प्‍यार करते हैं तो आपको.........

Image
अगर आप बच्‍चों से प्‍यार करते हैं तो आपको क्रान्ति के बारे में गम्‍भीरता से सोचना चाहिए आनन्‍द सिंह वैसे तो समाज में बढ़ती अमीर-ग़रीब के बीच की खाई , भुखमरी , कुपोषण , पर्यावरण विनाश और लोगों की आज़ादी पर तमाम किस्‍म की पाबन्दियाँ किसी भी संवेदनशील और न्‍यायप्रिय व्‍यक्ति के लिए मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढाँचे के क्रान्तिकारी बदलाव के बारे में सोचने की वजह होनी चाहिए , परन्‍तु यदि आपने खुद को क्रान्तिकारी बदलाव के संघर्षों से काटकर अपने परिवार की जिम्‍मेदारियों का निर्वहन करने तक इसलिए सीमित कर लिया है क्‍योंकि आपको क्रान्तिकारी बदलाव गैर-ज़रूरी या अव्‍यावहारिक लगता है तो यह नोट ज़रूर पढ़ें क्‍योंकि मुमकिन है कि इसे पढ़ने के बाद आप क्रान्ति के बारे में गम्‍भीरता से सोचने लग जाएँ। मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि हमारे समाज में तेज़ी से बह रही नफ़रत , मतलबपरस्‍ती , और हृदयहीनता की गरम हवा ने आपके व्‍यक्तित्‍व को इतना रूखा नहीं बना दिया है कि आप बच्‍चों से प्‍यार करना भूल चुके हैं। दूसरों के बच्‍चों से नहीं तो कम से कम अपने घर के बच्‍चों से तो प्‍यार करते ही होंगे। यह तो सच है कि आ...

कहानी - छिपा हुआ निशानची / लायम ओ' फ़्लैहर्टी Story - The Sniper / Liam O'Flaherty

Image
छिपा हुआ निशानची लेखक : लायम ओ ' फ़्लैहर्टी , अनुवाद : सुशांत सुप्रिय For English version please scroll down जून की शाम का लम्बा झुटपुटा रात में विलीन हो गया। डब्लिन अँधेरे के आवरण में लिपटा था , हालाँकि चाँद की मद्धिम रोशनी ऊन जैसे बादलों के बीच से झाँककर गलियों और लिफ़े के काले जल पर एक फीका प्रकाश डाल रही थी। इस प्रकाश से पौ फटने का आभास हो रहा था। घिरी हुई चार अदालतों के आसपास तोपें गरज रही थीं। शहर में यहाँ-वहाँ मशीनगन और राइफ़ल की गोलियों के चलने की आवाज़ें रात की नीरवता को तोड़ रही थीं , जैसे अलग-थलग पड़े खेत-खलिहानों में कुत्ते रुक-रुक कर भौंक रहे हों। गणतंत्रवादियों और राष्ट्रवादियों के बीच गृह-युद्ध चल रहा था। ओ ' कॉनेल पुल के पास की एक छत पर गणतंत्रवादी पक्ष का एक छिपा हुआ निशानची लेट कर चारों ओर नज़र रखे हुआ था। उसकी बगल में उसकी राइफ़ल पड़ी थी और उसके कंधे से दूरबीन लटक रही थी। उसका चेहरा किसी छात्र के चेहरे जैसा दुबला-पतला , तपस्वी-सा था किंतु उसकी आँखें किसी कट्टरपंथी की ठंडी , चमक भरी आँखों-सी लग रही थीं। वे चिंतन करने वाली गहरी आँखें थीं -- एक ऐस...

विभाजन की त्रासदी पर मोहन राकेश की कहानी - मलबे का मालिक

Image
  मोहन राकेश की कहानी - मलबे का मालिक साढ़े सात साल के बाद वे लोग लाहौर से अमृतसर आये थे। हॉकी का मैच देखने का तो बहाना ही था , उन्हें ज़्यादा चाव उन घरों और बाज़ारों को फिर से देखने का था जो साढ़े सात साल पहले उनके लिए पराये हो गये थे। हर सडक़ पर मुसलमानों की कोई-न-कोई टोली घूमती नज़र आ जाती थी। उनकी आँखें इस आग्रह के साथ वहाँ की हर चीज़ को देख रही थीं जैसे वह शहर साधारण शहर न होकर एक अच्छा-ख़ासा आकर्षण-केन्द्र हो। तंग बाज़ारों में से गुज़रते हुए वे एक-दूसरे को पुरानी चीज़ों की याद दिला रहे थे...देख-फतहदीना , मिसरी बाज़ार में अब मिसरी की दुकानें पहले से कितनी कम रह गयी हैं! उस नुक्कड़ पर सुक्खी भठियारिन की भट्‌ठी थी , जहाँ अब वह पानवाला बैठा है।...यह नमक मंडी देख लो , ख़ान साहब! यहाँ की एक-एक लालाइन वह नमकीन होती है कि बस...! बहुत दिनों के बाद बाज़ारों में तुर्रेदार पगडिय़ाँ और लाल तुरकी टोपियाँ नज़र आ रही थीं। लाहौर से आये मुसलमानों में काफ़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जिन्हें विभाजन के समय मज़बूर होकर अमृतसर से जाना पड़ा था। साढ़े स...