कविता - मनुष्य / एदुअर्द्स मीज़ेलाइतिस
लिथुआनिया की कविता - मनुष्य एदुअर्द्स मीज़ेलाइतिस धरती के गोले पर टिके हैं दो पैर। मेरे दो हाथ बढ़ते हैं सूर्य के घेरे की ओर। धरती के गोले और सूर्य के घेरे के बीच यूँ खड़ा हूँ मैं... गोल है मेरा सिर -- धरती के गोले की तरह -- जिसके भीतर -- कोयले और खनिज की परतों के भांति -- स्थित है मेरा मस्तिष् क जो कोई कम मूल् यवान नहीं है। मैं खोदता हूँ इसे और ढालता हूँ लोहे के औजार और सभी तरह की भीमकाय मशीनें: रेलें जोड़ती सुदूर देशों को एक साथ , जलयान हर मौसम में जोतते हुए समुद्र , वायुयान परिन् दों को शर्माती जिनकी उड़ान , राकेट लगभग द्रुत ज् यों प्रकाश और शीघ्रगामी ज् यों मेरे विचारों की उड़ान.... गोल है मेरा सिर -- सूर्य के घेरे की तरह -- जिसके भीतर से फूटती हैं बहती हुई सभी ओर , चारों दिशाओं में अनवरत चमत् कारी किरणें : वे धरती पर संजोती हैं , पोसती हैं जीवन वहाँ सतत् जन् म को बढ़ावा देती है ... यह धरती क् या है ? क् या ...