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कविता - रोटियों की ख़ातिर / आनन्‍द सिंह

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कविता - रोटियों की ख़ातिर / आनन्‍द सिंह   इन रोटियों की ही तलाश में ही वे आये थे गाँव से उजड़कर शहर में रोटियों की ही ख़ातिर उन्होंने फ़ैक्टरी में लोहा गलाया और गलाया अपना हाड़मांस अचानक रोटी की तलाश में वे फिर से गाँव की ओर रुखसत हुए लेकिन इससे पहले कि वे रोटी खा पाते उनके गलाये गए लोहे की पटरियों और पहियों के बीच कुचल दिया गया उनका हाड़मांस संदर्भ -  आज यानी 8 मई को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेलवे ट्रैक पर सो रहे 16 मजदूर ट्रेन की चपेट में आकर मारे गए। फोटो में दिख रही रोटियां उन्हीं में से किसी मजदूर की है। यूं तो यह मौतें एक दुर्घटना के तौर पर दर्ज होंगी पर यह संस्थागत हत्याएं हैं। पूरे देश में मजदूरों मेहनतकशों के आज हाल बेहाल हैं। सरकार ने लॉक डाउन तो कर दिया पर मजदूरों के लिए कहीं पर कोई सुविधा नहीं है। ज्यादातर जगहों पर स्वयंसेवी संगठन या कुछ उदार हृदय लोग मजदूरों के लिए खाने की व्यवस्था कर रहे हैं पर जाहिर है कि वह पूरे देश के मजदूरों के लिए कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकता। फासीवादी सरकार और अमानवीय प्रशासनिक अमले के लिए अभी भी मजदूर सिर्फ एक ...

चटगाँव विद्रोह की शहीद क्रान्तिकारी प्रीतिलता वाडेदार के जन्मदिवस (5 मई 1911) पर

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चटगाँव विद्रोह की शहीद क्रान्तिकारी प्रीतिलता वाडेदार के जन्मदिवस ( 5 मई  1911) पर आज हम एक ऐसी क्रान्ति‍कारी साथी का जीवन परि‍चय दे रहे हैं जि‍न्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमि‍साल कुर्बानी दी। प्रीति‍लता वाडेदार का जन्म 5 मई , 1911 को चटगाँव में हुआ था। उनके पि‍ता जगतबन्धु जि‍ला मजिस्ट्रेट कार्यालय में बड़े बाबू थे और माँ प्रति‍भामयी ‘महि‍ला जागरण’ के काम में लगी थीं। प्रीति‍लता वाडेदार बहुत ही प्रति‍भाशाली युवती थीं। 1930 में उन्होंने ढाका कॉलेज से 12 वीं पास की और पूरे कालेज में प्रथम आयीं। स्कूली जीवन में ही वे बालचर-संस्था की सदस्य हो गयी थीं। वहाँ उन्होंने सेवाभाव और अनुशासन का पाठ पढ़ा। बालचर संस्था में सदस्यों को ब्रिटिश सम्राट के प्रति एकनिष्ठ रहने की शपथ लेनी होती थी। संस्था का यह नियम प्रीतिलता को खटकता था। उनके मन में बग़ावत का बीज यहीं से पनपा था। देश में कि‍सानों-मज़दूरों की दुर्दशा और उन पर अँग्रेजों द्वारा बर्बर शोषण , उत्पीड़न देखकर प्रीति‍लता के मन में तूफान उठा और उन्होंने अपनी प्रति‍भा और योग्यता का उपयोग अपना कैरि‍यर बनाने ...

युगांडा के कवि सोलोमन ओचो-ओबुरु की तीन कविताएं Three Poems of Ugandan Poet Solomon Ochwo-Oburu

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युगांडा के कवि सोलोमन ओचो-ओबुरु की तीन कविताएं (अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र) Three Poems of Ugandan Poet Solomon Ochwo-Oburu 1. जब आप सो रहे हों जब आप सो रहे हों एक आंख ज़रूर जगी होनी चाहिये क्योंकि जब ख़तरा आ ही जाये सिर पर वह एक गवाह तो हो ही सकती है जब आप सो रहे हों एक हाथ को तो मुस्तैद होना ही चाहिये क्योंकि यदि आ ही जाये कोई लुटेरा वह शरीर का बचाव तो कर सकता है जब आप सो रहे हों एक कान को सतर्क रहना ही चाहिये क्योंकि यदि कोई फुसफुसाये वह राज़ की बात सुन तो सकता ही है आप यदि मर भी जाते हैं , तब भी मरें नहीं मौत को इतनी भी छूट न दें कि वह आपको मार दे When you fall asleep when you fall asleep let one eye stay awake that when danger approaches it can be a witness when you fall asleep let one arm stay active that when a robber comes it can defend the body when you fall asleep let one ear stay alert that when someone whispers it can hear the secrets even when you die, do not die do not allow death to kill ...

कोविड-19, बुर्जुआ सामाजिक-राजनीतिक ढाँचा और बुर्जुआ मानवतावाद

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कोविड- 19, बुर्जुआ सामाजिक-राजनीतिक ढाँचा और बुर्जुआ मानवतावाद कविता कृष्णपल्लवी कोविड- 19 की भयावह विभीषिका के दौरान जितना पूँजीवाद का सामाजिक-राजनीतिक ढाँचा और उसका पैशाचिक मानवद्रोही चरित्र नंगा हुआ है , उतना ही चैरिटी और बुर्जुआ मानवतावाद का चरित्र भी नंगा हुआ है। यह तथ्य अब एकदम साफ़ हो चुका है कि जनवरी में कोरोना का पहला केस आने के बाद मोदी सरकार ने आपराधिक लापरवाही की। सुरक्षा-किट्स आदि का मार्च तक निर्यात होता रहा। जाँच की पहले से कोई तैयारी नहीं हुई। इस महामारी का मुकाबला करने के लिए 15 हज़ार करोड़ का बजट तय हुआ , जबकि राजधानी के सेंट्रल विस्टा के निर्माण का बजट 20,000 करोड़ था। सरकार ने इस संकटकाल में इतना भी नहीं किया कि सेंट्रल विस्टा के निर्माण और एन.पी.आर. के लिए निर्धारित बजट को ही तात्कालिक तौर पर कोरोना के मुकाबले में लगा दिया जाता। होना तो यह चाहिए था कि स्पेन की तरह सभी निजी चिकित्सा-संस्थानों का अधिग्रहण करके वहाँ कोविड- 19 के लिए निःशुल्क जाँच , क्वैरेन्टाइन और आइसोलेशन बेड आदि का इंतज़ाम किया जाता। पर इसके उलट , सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में निजी जाँच-केन...

'राष्‍ट्र के नाम सम्‍बोधन' में फिर से प्रचारमन्‍त्री के झूठों की बौझार और सच्‍चाइयां

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' राष्‍ट्र के नाम सम्‍बोधन ' में फिर से प्रचारमन्‍त्री के झूठों की बौझार और सच्‍चाइयां अभिनव सिन्हा  पहला झूठ: भारत सरकार ने सही समय पर सही कदम उठा लिया। सफेद झूठ! भारत में पहला केस 30 जनवरी को आया। उस समय भारत ने कुछ एयरपोर्टों पर मात्र तापमान लेना प्रारंभ किया था , न कि उपयुक्‍त स्‍क्रीनिंग करना। डब्‍ल्‍यूएचओ की तरफ से चेतावनियां आने के बावजूद ट्रम्‍प के स्‍वागत में हज़ारों लोगों को जुटाया गया। डब्‍ल्‍यूएचओ द्वारा स्‍प्‍ष्‍ट बताये जाने के बावजूद , भारत सरकार ने आक्रामक तरह से परीक्षण , पहचान व उपचार के लिए कोई कदम नहीं उठाया। और जब मामला हाथ से निकल गया तब अचानक बिना किसी तैयारी के तीन हफ्ते का लॉकडाउन घोषित कर दिया गया। इसका क्‍या नतीजा सामने आया है , उसके बारे में प्रचारमन्‍त्री ने एक शब्‍द भी नहीं कहा। दूसरा झूठ: उन्‍नत और अधिक सामर्थ्‍यवान देशों में भारत के मुकाबले अधिक कोरोना केस आये हैं और भारत ने उनके मुकाबले बहुत अच्‍छी तरह से इस महामारी का मुकाबला किया है। बिल्‍कुल झूठ! भारत में कोरोना केसों का सही आकलन करना ही सम्‍भव नहीं है , क्‍योंकि प्रति दस ...

फासिस्टों के आतंक-राज का प्रतिरोध करते चुटकुले

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फासिस्टों के आतंक-राज का प्रतिरोध करते चुटकुले कविता कृष्‍णपल्‍लवी  रुडोल्फ़ हर्ज़ोग जर्मनी के एक प्रसिद्ध इतिहासकार और फिल्म-निर्माता हैं। वह विख्यात फिल्म-निर्देशक वर्नर हर्जोग के बेटे हैं। उनकी एक डाक्यूमेंट्री ' लाफिंग विद हिटलर ' नात्सी दौर में जनता में प्रचलित चुटकुलों पर और इस बात पर केन्द्रित है कि जनता फासिस्टों का मज़ाक उड़ाकर किस प्रकार अपनी नफ़रत और प्रतिरोध की स्पिरिट का इजहार करती थी। यह डाक्यूमेंट्री जर्मन चैनल वन और बी बी सी पर बहुत लोकप्रिय हुई थी। 2011 में रुडोल्फ़ हर्ज़ोग की पुस्तक ' डेड फनी ' प्रकाशित हुई , जिसका अंग्रेज़ी सहित कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस पुस्तक में हर्ज़ोग ने उन तमाम मज़ाकों और चुटकुलों को शामिल किया है जो हिटलर के शासन-काल में आम लोग फासिस्टों के बारे में बनाते थे , एक दूसरे के कानों में फुसफुसाते थे और निजी बैठकियों में सुनाते थे। इनमें वे चुटकुले भी शामिल हैं जो कंसंट्रेशन कैम्पों में बंद लोग आपस में सुनाते थे और मौत के साए तले ठहाके लगाते थे। हर्ज़ोग की मान्यता है कि ये चुटकुले फासिज्म और दूसरे विश्वयुद्ध के ...

दूधनाथ सिंह की कहानी - नपनी

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दूधनाथ सिंह की कहानी - नपनी दूधनाथ सिंह (जन्म:17 अक्टूबर, 1936 एवं निधन 11 जनवरी, 2018) आधुनिक हिन् ‍ दी साहित् ‍ य के सबसे प्रसिद्ध कहानीकारों में से एक हैं कार स्टार्ट होते ही पिता जी ने पुत्र को आदेश दिया कि वह ट्रांजिस्टर बंद कर दे - `ये सब रद्द फद्द सुनने की क्या जरूरत है? कोई समाचार है। वे लोग क्या कर रहे हैं और कौन क्या बक रहा है, इससे हमें क्या मतलब? बेफालतू।' उन्होंने भुनभुना कर कहा। लड़के ने उनके चढ़े हुए तेवर देखे तो ट्रांजिस्टर बंद कर दिया। 'वैसे मैं गाना सुनने जा रहा था।' उसने सफाई दी। 'गाना फाना खाने को दे देगा?' पिता जी ने घुड़की दी। उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा। उनकी पत्नी, बेटी और बड़े बेटे के दो बच्चे। बच्चों ने बाबा को घूरते देखा तो वे सिटपिटा गये। 'और वो नपनी कहाँ है?' पिता जी ने पूछा। लड़के ने बताया कि नपनी और अधिकारी जी और चपरासी पीछे वाली कार में हैं। 'भागलपुर कितने मील है?' पिता जी ने पूछा। उनको बताया गया कि भागलपुर कितनी दूर है। पिता जी ने जेब से एक मैला कुचैला पर्स निकाला, खोल कर देखा औ...