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कविता - ख़ौफ़ से आज़ादी / रवीन्द्रनाथ ठाकुर Poem - Freedom from Fear / Rabindranath Thakur

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कविता - ख़ौफ़ से आज़ादी रवीन्द्रनाथ ठाकुर ( बांग्ला से अनुवाद : तनुज) ख़ौफ़ से आज़ादी ही हमारी सच्ची आज़ादी है, जिस पर मैं तुम्हारे लिए दावा ठोंकता हूँ मेरी मातृभूमि! पीढ़ियों के बोझ से आज़ादी, अपना सिर झुका कर चलते रहना, अपनी कमर की हड्डियाँ तोड़ लेना और भविष्य की पुकार पर मूंद लेना अपनी आँखों को! नींद की बेड़ियों से चाहिए हमें आज़ादी जिससे तुम रात के सन्नाटे में ख़ुद को जकड़ लेते हो, और उस सितारे पर ज़ाहिर करते हो अपना अविश्वास जो सत्य की साहसिक राहों तक हमें ले जाना चाहता है.. आज़ादी अपनी क़िस्मत की अराजकता से.. जिसकी पालें अंधी और अनिश्चित हवाओं के सामने कमजोर पड़ती जाती हैं, और पतवार हमेशा चला जाता है मौत के माफ़िक कठोर और ठंडे हाथों में.. कठपुतलियों की इस दुनिया में रहने के अपमान से आज़ादी, जहाँ हरकतें बद-दिमाग़ तंत्रिकाओं के ज़रिए शुरू होती हैं, नासमझ आदतों के द्वारा वे दोहराई जाती हैं, और आकृतियाँ धीरज और आज्ञाकारिता के साथ खेल के मालिक की प्रतीक्षा करती हैं, जिंदगी को किसी बदसूरत नकल में बदल डालने के लिए... Poem - Freedom from Fear  Rabindranath Thakur Freedom from fear is the freedom I cla...

युद्धोन्माद के माहौल में कुछ असुविधाजनक लेकिन सबसे अधिक प्रासंगिक सवाल

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युद्धोन्माद के माहौल में कुछ असुविधाजनक लेकिन सबसे अधिक प्रासंगिक सवाल जिन्हें सबसे अधिक अप्रासंगिक बना दिया गया है! कात्यायनी जब भी अंधराष्ट्रवाद , युद्धोन्माद और प्रतिशोधी सैन्यवाद की लहर पूरे समाज पर हावी हो जाती है और रक्तपिपासु मीडिया का गला "ख़ून के बदले ख़ून" की चीख-पुकार मचाते हुए फट जाता है तो सच्चे क्रान्तिकारी और जनपक्षधर लोग धारा के विरुद्ध खड़े होकर इस अंधी लहर का विरोध करते हैं और युद्ध के असली चरित्र का पर्दाफ़ाश करते हैं। इस परीक्षा में तमाम बुर्जुआ लिबरल्स और सोशल डेमोक्रेट्स हमेशा फेल होते हैं। कार्ल काउत्स्की से लेकर आजतक के सभी सोशल डेमोक्रेट्स की एक प्रमुख अभिलाक्षणिकता होती है -- अंधराष्ट्रवाद! सभी प्रतिक्रियावादी युद्धों में लिबरल्स और सोशल डेमोक्रेट्स उसीतरह अपने-अपने देशों के शासक वर्गों के साथ जा खड़े होते हैं जैसे कि देश के भीतर उठ खड़े होने वाले क्रान्तिकारी युद्धों में। सोचने की बात यह है कि शासक वर्गों की जो सत्ता अपने देश की जनता के विरुद्ध विविध रूपों में दिन-रात युद्ध छेड़े रहती है , वही दूसरे देशों से युद्ध या सीमा पर तनाव की स्थि...

मार्क ट्वेन की दो अमर कहानियों के‍ संकलन 'वह शख्‍स जिसने हैडलेबर्ग को भ्रष्‍ट कर दिया' की पीडीएफ फाइल The man that Corrupted Hadleyburg - PDF file of two timeless stories by Mark Twain

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मार्क ट्वेन की दो अमर कहानियों के‍ संकलन ' वह शख्‍स जिसने हैडलेबर्ग को भ्रष्‍ट कर दिया ' की पीडीएफ फाइल पूँजीवाद सभ्यता और मूल्यों पर सबसे तीखी और मारक चोट करने वालों में से एक , महान अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन की दो कालजयी कहानियाँ The man that Corrupted Hadleyburg PDF file of two timeless stories by Mark Twain पीडीएफ फाइल डाउनलोड लिंक  हिन्दी PDF in English (Story 1 - The Man that Corrupted Hadleyburg) PDF in English (Story 2 - The $30,000 Bequest) डाउनलोड करने में कोई समस्‍या आये तो 8828320322 पर व्‍हाटसएप्‍प संदेश भेजें हिन्दी संस्करण की प्रिण्ट कॉपी पाने के लिए यहां क्लि‍क करें  “ जीवन भर हमें ईमानदारी का सबक-दर-सबक सिखाया गया है-ऐसी ईमानदारी जिस पर कभी किसी लोभ-लालच की छाया ही नहीं पड़ने दी गयी। अरे यह ईमानदारी नक़ली है , ऊपर से लादी हुई , और लालच का पहला झोंका आते ही कपूर की तरह उड़ जाती है। ...मुझे यक़ीन है कि इस शहर की ईमानदारी भी उतनी ही सड़ी है जितनी मेरी , उतनी ही सड़ी जितनी तुम्हारी। ये एक घटिया शहर है ; कूपमण्डूक , बदबूदार शहर है ये। इसके पास कोई गुण नहीं है , सिव...

आज के दौर में नौजवानों से चंद बातें ...

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आज के दौर में नौजवानों से चंद बातें ... कविता कृष्णपल्लवी ये बातें "बुद्धि" और व्यावहारिकता के अपच-गैस से पीड़ित लोगों , या महज "वाद-विवाद-संवाद" का आनंद लेने वाले ' खलिहर ' निठल्लों या बाल की खाल निकाल कर ढोलक छवाने वाले गुणी जनों के लिए नहीं हैं। घोंसलावादी "सद्गृहस्थों" के लिए भी नहीं हैं। अगर आप थोड़ा लीक से हटकर चलने के बारे में सोचते हैं , अगर आप दुनिया बदलने के सपने और परियोजना के बारे में कुछ सोचते-विचारते हैं , अगर आपकी आत्मा यथास्थिति के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए बीच-बीच में तड़प उठती है , अगर आपके दिल में आम मेहनतक़श अवाम के जीवन , सपनों , संघर्षों और मिशन के साथ एकरूप हो जाने का काव्यात्मक विचार कभी-कभी आता हो और यह लगता हो कि आपके कलेजे में इतना दम है , तभी यह टिप्पणी पढ़िएगा। अन्यथा रहने ही दीजिएगा। आपसे न हो सकेगा। कल , यानी 5 मई को , कार्ल मार्क्स का जन्मदिन है। नई सदी में विश्व पूँजीवाद दीर्घकालिक मंदी और ठहराव की जिस दुश्चक्रीय निराशा से गुज़र रहा है , उसने सिद्ध कर दिया है कि मार्क्स की ऐतिहासिक भविष्यवाणी सही थी I मार्क्स...

घरेलू हिंसा के संरचनागत पक्ष पर कुछ बातें संक्षेप में

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घरेलू हिंसा के संरचनागत पक्ष पर कुछ बातें संक्षेप में कविता कृष्णपल्लवी घरेलू हिंसा के सवाल को मैं थोड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखती हूँ। दरअसल , विवाह या परिवार जैसी संस्थाओं की मूल प्रकृति ही पितृसत्तात्मक है और प्रागैतिहासिक वर्ग-समाजों से लेकर पूँजीवाद के युग तक -- परिवार वर्ग-समाज का एक बुनियादी स्तम्भ रहा है। यह वर्ग और जेंडर से सम्बंधित जड़ीभूत संस्कारों और पूर्वाग्रहों का प्रशिक्षण-केंद्र है जहाँ स्त्री को वफ़ादार , आज्ञाकारी गुलाम बनने का और पुरुष को कुशल , मक्कार या दमनकारी शासक बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। जिन परिवारों में खुले तौर पर स्त्रियाँ घरेलू हिंसा का शिकार नहीं होतीं वहाँ शान्ति उनके पूर्ण आत्म-समर्पण और व्यक्तित्वहीनता की शर्त पर स्थापित एक विषैली , दमघोंटू शान्ति होती है। ' अरेंज्ड मैरिज ' में तो एक खूँटे पर "पवित्र गाय" बाँध दी जाती है जिसका काम पुरुष-रूपी साँड़ को "कामदेव" मानकर उसे प्यार करने का दिखावा करते हुए अपना शरीर सौंपना , उससे बच्चे जनना (ताकि उसका वंश चले) और उसकी हर इच्छा पूरी करते हुए आजीवन उसकी सेवा करना होता है। इन...

कहानी - रफूजी / स्वदेश दीपक

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कहानी -  रफूजी स्वदेश दीपक नानी बिलकुल अनपढ़। अस्‍सी के ऊपर आयु होगी , लेकिन अंग्रेजी के कुछ शब्‍द उसे आते हैं - जैसे कि रिफ्यूजी , जिसे वह रफूजी बोलती है। कुछ शब्‍द इतिहास की उपज होते हैं , जो प्रतिदिन की जिंदगी का हिस्‍सा बन जाते हैं। ये शब्‍द राजा अथवा रानी की देन होते हैं। अंग्रेज जाते-जाते बँटवारा करा गए और विरासत में एक शब्‍द दे गए - रिफ्यूजी। जैसा कुछ वर्ष पहले हमारी महारानी मरी और विरासत में एक शब्‍द दे गई - उग्रवादी। सारा कस्‍बा उसे नानी कह कर बुलाता है। शायद परिवार के सदस्‍यों के अलावा किसी को भी असली नाम मालूम या याद नहीं। जिस्‍म के सारे हिस्‍से जिस्‍म का साथ छोड़ चुके हैं सिवा आवाज के। फटे ढोल की तरह की आवाज - एकदम कानफाड़ और ऊँची। बेटे तो बँटवारे की भेंट चढ़ गए , एक लड़की बची थी , इसलिए कि विभाजन से पहले वह जालंधर में ब्‍याही गई। अब यह भी नहीं। उसके बेटे , अपने दोहते के साथ नानी रहती है , इस कस्‍बे में। कलेमों में थोड़ी जमीन मिल गई , मकान भी बनवा लिया। दोहता कॉलेज में पढ़ाता है , लेकिन नानी उसे प्रोफेसर नहीं , मास्टर कह कर बुलाती है। उसकी समझ में सब पढ़ानेवाल...