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ग़ाज़ा के एक बच्‍चे की कविता / कविता कृष्णपल्लवी

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ग़ाज़ा के एक बच्‍चे की कविता कविता कृष्णपल्लवी बाबा! मैं दौड़ नहीं पा रहा हूँ। ख़ून सनी मिट्टी से लथपथ मेरे जूते बहुत भारी हो गये हैं। मेरी आँखें अंधी होती जा रही हैं आसमान से बरसती आग की चकाचौंध से। बाबा! मेरे हाथ अभी पत्‍थर बहुत दूर तक नहीं फेंक पाते और मेरे पंख भी अभी बहुत छोटे हैं। बाबा! गलियों में बिखरे मलबे के बीच छुपम-छुपाई खेलते कहाँ चले गये मेरे तीनों भाई? और वे तीन छोटे-छोटे ताबूत उठाये दोस्‍तों और पड़ोसियों के साथ तुम कहाँ गये थे? मैं डर गया था बाबा कि तुम्‍हें पकड़ लिया गया होगा और कहीं किसी गुमनाम अँधेरी जगह में बन्‍द कर दिया गया होगा जैसा हुआ अहमद, माजिद और सफ़ी के अब्‍बाओं के साथ। मैं डर गया था बाबा कि मुझे तुम्‍हारे बिना ही जीना पड़ेगा जैसे मैं जीता हूँ अम्‍मी के बिना उनके दुपट्टे के दूध सने साये और लोरियों की यादों के साथ। मैं नहीं जानता बाबा कि वे लोग क्‍यों जला देते हैं जैतून के बागों को, नहीं जानता कि हमारी बस्तियों का मलबा हटाया क्‍यों नहीं गया अबतक और नये घर बनाये क्‍यों नहीं गये अबतक! बाबा! इस बहुत बड़ी दुनिया में बहुत सारे बच्‍चे होंगे हमारे ही जैसे और उनके भी व...

फ़िलिस्‍तीन और इज़रायल - न्‍याय और अन्‍याय के बीच की लड़ाई - आप किसके साथ ?

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  इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों को इज़रायल का विरोध और फ़िलिस् ‍ तीन का समर्थन क् ‍ यों करना चाहिए? आनन्‍द सिंह मैं इन् ‍ साफ़पसन् ‍ द लोगों से मुख़ातिब हूँ। जो लोग न् ‍ याय और अन् ‍ याय के बीच की लड़ाई में ताक़त के हिसाब से या समाज और मीडिया में प्रचलित धारणाओं के अुनसार अपना पक्ष चुनते हैं वो इस पोस् ‍ ट को न पढ़ें। आज जब दुनियाभर में लोग कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं और हमारे देश में हुक् ‍ मरानों के निकम् ‍ मेपन की वजह से हम अपने देश के भीतर एक नरसंहार के गवाह बन रहे हैं, वहीं इस महामारी के बीच हज़ारों मील दूर ग़ाज़ा में ज़ायनवादी इज़रायल एक बार फिर मानवता के इतिहास के सबसे बर्बर क़िस् ‍ म के नरसंहार को अंजाम दे रहा है। इस वीभत् ‍ स नरसंहार पर ख़ामोश रहकर या दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर हम इसे बढ़ावा देने का काम करेंगे। जो लोग इज़रायल और फ़िलिस् ‍ तीन के विवाद के इतिहास को ढंग से नहीं जानते वही लोग दोनो पक्षों को बराबर का ज़िम् ‍ मेदार ठहराकर दोनों से हिंसा छोड़ने का आग्रह करते हैं। अगर वो संज़ीदगी से इतिहास पढ़ते तो पाते कि 1948 में इज़रायल नामक राष् ‍ ट्र का जन् ‍...

एक मामूली दुःख का रोजनामचा / महमूद दरवेश

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महमूद दरवेश : एक मामूली दुःख का रोजनामचा अनुवाद व संक्षिप् ‍ त परिचय ब् ‍ लॉगर मनोज पटेल "हर अच्छी कविता प्रतिरोध की एक कार्रवाही है." ऐसा मानने वाले फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश ने अपनी कविताओं जितना ही अच्छा गद्य भी लिखा है. इस आत्मकथात्मक किस्म के गद्य में उनकी नजरबंदी, इजरायली अधिकारियों की पूछताछ और जेल में बिताए उनके दिनों का ब्योरा है. यहाँ भी निर्वासन और अपनी मातृभूमि के लिए उनकी गहरी तड़प कदम-कदम पर दिखती है. उनका गद्य इतना काव्यात्मक है कि इसे उनकी कविताओं से अलगाना बेहद मुश्किल है. यहाँ प्रस्तुत अंश 'जर्नल आफ ऐन आर्डिनरी ग्रीफ' से... 1 -- तूफ़ान के गुजरने तक नीचे झुक जाओ मेरी जान. -- हमेशा के इस नीचे झुकने से मेरी पीठ धनुष हो गयी है. तुम अपना तीर कब चलाने जा रहे हो ? [ आप अपना हाथ दूसरे हाथ तक ले जाते हैं, और मुट्ठी भर आटा पाते हैं ] -- तूफ़ान के गुजरने तक नीचे झुक जाओ मेरी जान. -- हमेशा के इस नीचे झुकने से मेरी पीठ पुल हो गयी है. तुम पार कब उतरोगे ? [ आप अपना पैर बढ़ाने की कोशिश करते हैं, लेकिन लोहा हिलता भी नहीं ] -- तूफ़ान के गुजरने तक नीचे झुक जाओ...

तुर्की के तानाशाह एर्दोआन के खिलाफ संघर्ष में शहीद - संगीतकार हेलिन बोलेक और इब्राहीम गोक्चेक

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हेलिन बोलेक और इब्राहीम गोक्चेक की याद दुनियाभर में फ़ासिस्टों और तानाशाहों के ख़िलाफ़ संघर्ष में हमें प्रेरित करती रहेगी। सत्‍यम हेलिन बोलेक के बाद 8 मई 2020 के दिन उनके साथी संगीतकार इब्राहीम गोक्चेक भी को हमसे जुदा हो गये थे। वे अपना गिटार खुलकर बजा सकें, इसी आज़ादी की माँग पर 323* दिनों की भूख हड़ताल के बाद इब्राहीम भी अपनी साथी हेलिन के पीछे चले गये थे जिसने 288 दिनों की भूख हड़ताल के बाद 3 अप्रैल 2020 को हमारा साथ छोड़ा था। (*तुर्की में यह परम्परा रही है कि भूख हड़ताल के दौरान कुछ भी ठोस नहीं खाते, पर तरल पदार्थ ले सकते हैं।) ये दोनों तुर्की के क्रान्तिकारी संगीत बैंड ‘ग्रुप योरम’ के सदस्य थे। एर्दोआन की बर्बर हुक़ूमत ने इस बैंड पर इसलिए प्रतिबन्ध लगा दिया गया था क्योंकि वे उसकी ज़ालिम और दकियानूस सत्ता का विरोध करते थे और समाजवाद और मज़दूर वर्ग के गीत गाते थे। 2016 में बैंड के सभी सदस्यों की गिरफ़्तारी के फ़रमान के बाद पुलिस ने उनके सांस्कृतिक केंद्र पर छापा मारा और उनके वाद्य यंत्रों तक को नष्ट कर दिया था। तुर्की में पहली बार, कलाकारों के सिर पर ईनाम रखे गये और उन्हें “फ़रार आत...

कविता - मध्यवर्गीय भलेमानस नागरिक से कुछ बातें / कविता कृष्‍णपल्‍लवी

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मध्यवर्गीय भलेमानस नागरिक से कुछ बातें कविता  कृष्‍णपल्‍लवी . आप अच्छे व्यक्ति हैं! ठीक है , पर इतना काफ़ी नहीं है। आप में सही और ग़लत में फ़र्क करने की तमीज़ होनी चाहिए और इतनी मनुष्यता भी होनी चाहिए कि जो भी ग़लत और अन्यायपूर्ण हो उससे नफ़रत करते रह सकें ताउम्र , दिल की गहराइयों से। आपमें सही और ग़लत में फ़र्क करने की तमीज़ है , अच्छी बात है! आप नफ़रत करते हैं ग़लत चीज़ों से और नाइंसाफ़ी से , बहुत अच्छी बात है! लेकिन आपको इसे खुलकर कहना भी चाहिए! आप सही और ग़लत के बारे में खुलकर बातें करते हैं और इंसाफ़ की बातें करते हैं , अच्छा है! लेकिन आपमें सही बात के लिए और इंसाफ़ के लिए लड़ने का और इस मक़सद के लिए लोगों को जगाने और संगठित करने का साहस और धीरज भी होना चाहिए। आपमें यह भी है तो और अच्छी बात है! लेकिन आपको यह भी पता होना चाहिए कि नाइंसाफ़ी और लूट और ज़ुल्म का कारण कुछ लोग नहीं बल्कि एक पूरी सामाजिक व्यवस्था है। अगर आप यह भी समझते हैं तो बड़ी बात है! लेकिन आपको फिर इस व्यवस्था के बारे में जानना होगा , इससे लाभान्वित होने वाले वर्गों और इसे चलाने वाले लोगों और ...