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कहानी - टिटवाल का कुत्ता / सआदत हसन मंटो Story - The Dog of Ṭeṭval / Saadat Hasan Manto

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टिटवाल का कुत्ता सआदत हसन मंटो For English version please scroll down  कई दिनों से दोनों तरफ से सिपाही अपने-अपने मोर्चे पर जमे हुए थे। दिन में इधर और उधर से दस-बारह गोलियाँ चल जातीं , जिनकी आवाज़ के साथ कोई इनसानी चीख बुलन्द नहीं होती थी। मौसम बहुत खुशनुमा था। हवा जंगली फूलों की महक में बसी हुई थी। पहाडिय़ों की ऊँचाइयों और ढलानों पर लड़ाई से बेखबर कुदरत , अपने रोज के काम-काज में व्यस्त थी। चिडिय़ाँ उसी तरह चहचहाती थीं। फूल उसी तरह खिल रहे थे और धीमी गति से उडऩे वाली मधुमक्खियाँ , उसी पुराने ढंग से उन पर ऊँघ-ऊँघ कर रस चूसती थीं। जब गोलियाँ चलने पर पहाडिय़ों में आवाज़ गूँजती और चहचहाती हुई चिडिय़ाँ चौंककर उडऩे लगतीं , मानो किसी का हाथ साज के गलत तार से जा टकराया हो और उनके कानों को ठेस पहुँची हो। सितम्बर का अन्त अक्तूबर की शुरूआत से बड़े गुलाबी ढंग से गले मिल रहा था। ऐसा लगता था कि जाड़े और गर्मी में सुलह-सफाई हो रही है। नीले-नीले आसमान पर धुनी हुई रुई जैसे , पतले-पतले और हल्के-हल्के बादल यों तैरते थे , जैसे अपने सफेद बजरों में नदी की सैर कर रहे हैं। पहाड़ी मोर्चों पर...

कहानी - लकड़ियाँ / असगर वज़ाहत

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कहानी - लकड़ियाँ असगर वज़ाहत (1) श्यामा की जली हुई लाश जब उसके पिता के घर पहुंची तो बड़ी भीड़ लग गयी। इतनी भीड़ तो उसकी शादी में विदाई के समय भी नहीं लगी थी। श्याम की बहनों की हालत अजीब थी क्योंकि वे कुंवारी थीं। श्यामा की मां लगातार रोई जा रही थी। रिश्तेदार उसे दिलासा भी क्यों देते। श्यामा के पिता जली हुई श्यामा को देख रहे थे। उनकी आंखों से आंसू बहे चले जा रहे थे। श्यामा का पति और देवर पास खड़े थे। श्यामा के पति ने श्यामा के पिताजी से कहा 'पापा आप रोते क्यों हैं. . .श्यामा को बिदा करते समय आपने ही तो कहा था कि बेटी तुम्हारी डोली इस घर जा रही है अब तुम ससुराल से तुम्हारी अर्थी ही निकले।' देवर बोला 'चाचा जी श्यामा ने आपकी इच्छा जल्दी ही पूरी कर दी।' श्यामा के ससुर जी बोले 'बेकार समय न बर्बाद करो। अब यहां तमाशा न लगाओ। चलो जल्दी क्रिया-करम कर दिया जाये।' (2) श्यामा की जली हुई लाश थाने पहुंची तो वहां पहले से ही दो नवविवाहिता लड़कियों की जली हुई लाशें रखी थीं। थाने में शांति थी। पीपल के पत्ते हवा में खड़खड़ा रहे थे और जीप का इंजन लंबी-लंबी सांसें ले रहा था...

कविता - रोटियों की ख़ातिर / आनन्‍द सिंह

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कविता - रोटियों की ख़ातिर / आनन्‍द सिंह   इन रोटियों की ही तलाश में ही वे आये थे गाँव से उजड़कर शहर में रोटियों की ही ख़ातिर उन्होंने फ़ैक्टरी में लोहा गलाया और गलाया अपना हाड़मांस अचानक रोटी की तलाश में वे फिर से गाँव की ओर रुखसत हुए लेकिन इससे पहले कि वे रोटी खा पाते उनके गलाये गए लोहे की पटरियों और पहियों के बीच कुचल दिया गया उनका हाड़मांस संदर्भ -  आज यानी 8 मई को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेलवे ट्रैक पर सो रहे 16 मजदूर ट्रेन की चपेट में आकर मारे गए। फोटो में दिख रही रोटियां उन्हीं में से किसी मजदूर की है। यूं तो यह मौतें एक दुर्घटना के तौर पर दर्ज होंगी पर यह संस्थागत हत्याएं हैं। पूरे देश में मजदूरों मेहनतकशों के आज हाल बेहाल हैं। सरकार ने लॉक डाउन तो कर दिया पर मजदूरों के लिए कहीं पर कोई सुविधा नहीं है। ज्यादातर जगहों पर स्वयंसेवी संगठन या कुछ उदार हृदय लोग मजदूरों के लिए खाने की व्यवस्था कर रहे हैं पर जाहिर है कि वह पूरे देश के मजदूरों के लिए कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकता। फासीवादी सरकार और अमानवीय प्रशासनिक अमले के लिए अभी भी मजदूर सिर्फ एक ...

चटगाँव विद्रोह की शहीद क्रान्तिकारी प्रीतिलता वाडेदार के जन्मदिवस (5 मई 1911) पर

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चटगाँव विद्रोह की शहीद क्रान्तिकारी प्रीतिलता वाडेदार के जन्मदिवस ( 5 मई  1911) पर आज हम एक ऐसी क्रान्ति‍कारी साथी का जीवन परि‍चय दे रहे हैं जि‍न्होंने जनता के लिए चल रहे संघर्ष में बेहद कम उम्र में बेमि‍साल कुर्बानी दी। प्रीति‍लता वाडेदार का जन्म 5 मई , 1911 को चटगाँव में हुआ था। उनके पि‍ता जगतबन्धु जि‍ला मजिस्ट्रेट कार्यालय में बड़े बाबू थे और माँ प्रति‍भामयी ‘महि‍ला जागरण’ के काम में लगी थीं। प्रीति‍लता वाडेदार बहुत ही प्रति‍भाशाली युवती थीं। 1930 में उन्होंने ढाका कॉलेज से 12 वीं पास की और पूरे कालेज में प्रथम आयीं। स्कूली जीवन में ही वे बालचर-संस्था की सदस्य हो गयी थीं। वहाँ उन्होंने सेवाभाव और अनुशासन का पाठ पढ़ा। बालचर संस्था में सदस्यों को ब्रिटिश सम्राट के प्रति एकनिष्ठ रहने की शपथ लेनी होती थी। संस्था का यह नियम प्रीतिलता को खटकता था। उनके मन में बग़ावत का बीज यहीं से पनपा था। देश में कि‍सानों-मज़दूरों की दुर्दशा और उन पर अँग्रेजों द्वारा बर्बर शोषण , उत्पीड़न देखकर प्रीति‍लता के मन में तूफान उठा और उन्होंने अपनी प्रति‍भा और योग्यता का उपयोग अपना कैरि‍यर बनाने ...

युगांडा के कवि सोलोमन ओचो-ओबुरु की तीन कविताएं Three Poems of Ugandan Poet Solomon Ochwo-Oburu

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युगांडा के कवि सोलोमन ओचो-ओबुरु की तीन कविताएं (अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र) Three Poems of Ugandan Poet Solomon Ochwo-Oburu 1. जब आप सो रहे हों जब आप सो रहे हों एक आंख ज़रूर जगी होनी चाहिये क्योंकि जब ख़तरा आ ही जाये सिर पर वह एक गवाह तो हो ही सकती है जब आप सो रहे हों एक हाथ को तो मुस्तैद होना ही चाहिये क्योंकि यदि आ ही जाये कोई लुटेरा वह शरीर का बचाव तो कर सकता है जब आप सो रहे हों एक कान को सतर्क रहना ही चाहिये क्योंकि यदि कोई फुसफुसाये वह राज़ की बात सुन तो सकता ही है आप यदि मर भी जाते हैं , तब भी मरें नहीं मौत को इतनी भी छूट न दें कि वह आपको मार दे When you fall asleep when you fall asleep let one eye stay awake that when danger approaches it can be a witness when you fall asleep let one arm stay active that when a robber comes it can defend the body when you fall asleep let one ear stay alert that when someone whispers it can hear the secrets even when you die, do not die do not allow death to kill ...