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व्‍यंग्‍य कथा - उखड़े खंभे / हरिशंकर परसाई

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व्‍यंग्‍य कथा - उखड़े खंभे / हरिशंकर परसाई एक दिन राजा ने खीझकर घोषणा कर दी कि मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भे से लटका दिया जाऐगा। सुबह होते ही लोग बिजली के खम्भों के पास जमा हो गये। उन्होंने खम्भों की पूजा की , आरती उतारी और उन्हें तिलक किया। शाम तक वे इंतजार करते रहे कि अब मुनाफाखोर टांगे जाऐंगे- और अब। पर कोई नहीं टाँगा गया। लोग जुलूस बनाकर राजा के पास गये और कहा ," महाराज , आपने तो कहा था कि मुनाफाखोर बिजली के खम्भे से लटकाये जाऐंगे , पर खम्भे तो वैसे ही खड़े हैं और मुनाफाखोर स्वस्थ और सानन्द हैं।" राजा ने कहा ," कहा है तो उन्हें खम्भों पर टाँगा ही जाऐगा। थोड़ा समय लगेगा। टाँगने के लिये फन्दे चाहिये। मैंने फन्दे बनाने का आर्डर दे दिया है। उनके मिलते ही , सब मुनाफाखोरों को बिजली के खम्भों से टाँग दूँगा। भीड़ में से एक आदमी बोल उठा ," पर फन्दे बनाने का ठेका भी तो एक मुनाफाखोर ने ही लिया है।" राजा ने कहा ," तो क्या हुआ ? उसे उसके ही फन्दे से टाँगा जाऐगा।" तभी दूसरा बोल उठा ," पर वह तो कह रहा था कि फाँसी पर लटकाने का ठेका भी ...

व्‍यंग्‍य कथा - इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर / हरिशंकर परसाई

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व्‍यंग्‍य कथा - इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर / हरिशंकर परसाई वैज्ञानिक कहते हैं , चाँद पर जीवन नहीं है। सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन (डिपार्टमेंट में एम. डी. साब) कहते हैं- वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं , वहाँ हमारे जैसे ही मनुष्य की आबादी है। विज्ञान ने हमेशा इन्स्पेक्टर मातादीन से मात खाई है। फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है- छुरे पर पाए गए निशान मुलज़िम की अँगुलियों के नहीं हैं। पर मातादीन उसे सज़ा दिला ही देते हैं। मातादीन कहते हैं , ये वैज्ञानिक केस का पूरा इन्वेस्टीगेशन नहीं करते। उन्होंने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया , वहाँ जीवन नहीं है। मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देख कर आया हूँ। वहाँ मनुष्य जाति है। यह बात सही है क्योंकि अँधेरे पक्ष के मातादीन माहिर माने जाते हैं। पूछा जाएगा , इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गए थे ? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड़ने ? नहीं , वे भारत की तरफ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत गए थे। चाँद सरकार ने भारत सरकार को लिखा था- यों हमारी सभ्यता बहुत आगे बढ़ी है। पर हमारी पुलिस में पर्याप्त सक्षमता नहीं है। वह अपराधी का ...

कविता - हत्यारा कवि / अदनान कफ़ील दरवेश

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हत्यारा कवि अदनान कफ़ील दरवेश उसकी कविताएँ मुझे चकित करती रहीं  उसकी लिखी पंक्तियाँ पढ़कर  अक्सर  मन करुणा से भर-भर जाता  कैसे कहूँ कि उसकी कविताएँ पढ़कर रोया हूँ बारहा आधी रातों के सुनसानों में बहुत दिनों तक उसे उसकी कविताओं से ही जाना था  अचानक वो मिल गया किसी गोष्ठी में  और उससे सीधे पहचान हुई धीरे-धीरे पता चला उसका राजनीतिक पक्ष  जो कि हत्यारों की तरफ़ था  मेरे पाँव से ज़मीन खिसक गई विश्वास नहीं हुआ कि कैसे मेरा प्रिय कवि  हत्यारों की ढाल बन सकता है  जी हुआ उसकी कविताएँ जला दूँ  जिसे पढ़कर रोया था बार-बार फिर अचानक उसकी एक और कविता पढ़ी  फिर मन बदल लिया कोई कवि इतना अदाकार कैसे हो सकता है कविता में  अब भी चकित हूँ नोचूँ हूँ घास  देखूँ हूँ उसकी तस्वीर, उसका मासूम चेहरा जिसपर फैली है गुनगुनी धूप सोचूँ हूँ शायद वो कल मेरी हत्या करने मेरे गले पर छुरी रखे  तो मैं उसका विरोध भी न कर पाऊँ  अजीब प्रेम है उससे मुझे उफ़्फ़ शायद उसे कहूँ कि भाई गला काट के हाथ...

असग़र वजाहत की कहानी - लिंचिंग Asghar Wajahat's story - Lynching

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असग़र वजाहत की कहानी - लिंचिंग बूढ़ी औरत को जब यह बताया गया कि उसके पोते सलीम की 'लिंचिंग' हो गई है तो उसकी समझ में कुछ न आया। उसके काले, झुर्रियों पड़े चेहरे और धुंधली मटमैली आंखों में कोई भाव न आया। उसने फटी चादर से अपना सिर ढक लिया। उसके लिए 'लिंचिंग' शब्द नया था। पर उसे यह अंदाजा हो गया था कि यह अंग्रेजी का शब्द है। इससे पहले भी उसने अंग्रेजी के कुछ शब्द सुने थे जिन्हें वह जानती थी। उसने अंग्रेजी का पहला शब्द 'पास' सुना था जब सलीम पहली क्लास में 'पास' हुआ था। वह जानती थी के 'पास' का क्या मतलब होता है। दूसरा शब्द उसने 'जॉब' सुना था। वह समझ गई थी कि 'जॉब' का मतलब नौकरी लग जाना है। तीसरा शब्द उसने 'सैलरी' सुना था। वह जानती थी 'सैलरी' का क्या मतलब होता है। यह शब्द सुनते ही उसकी नाक में तवे पर सिकती रोटी की सुगंध आ जाया करती थी। उसे अंदाज़ा था कि अंग्रेजी के शब्द अच्छे होते हैं और उसके पोते के बारे में यह कोई अच्छी खबर है। बुढ़िया इत्मीनान भरे स्वर में बोली- अल्लाह उनका भला करें.. लड़के हैरत से उसे देखने ल...

प्रेमचन्द की कहानी - नशा

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प्रेमचन्द की कहानी   - नशा ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं एक गरीब क्लर्क का , जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थीं। मैं जमींदारी की बुराई करता , उन्हें हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता। वह जमींदारों का पक्ष लेता , पर स्वभावत: उसका पहलू कुछ कमजोर होता था , क्योंकि उसके पास जमींदारों के अनुकूल कोई दलील न थी। वह कहता कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते , छोटे-बड़े हमेशा होते रहते हैं और होते रहेंगे , लचर दलील थी। किसी मानुषीय या नैतिक नियम से इस व्यवस्था का औचित्य सिद्ध करना कठिन था। मैं इस वाद-विवाद की गर्मी-गर्मी में अक्सर   तेज हो जाता और लगने वाली बात कह जाता , लेकिन ईश्वरी हारकर भी मुस्कराता रहता था। मैंने उसे कभी गर्म होते नहीं देखा। शायद इसका कारण यह था कि वह अपने पक्ष की कमजोरी समझता था। नौकरों से वह सीधे मुँह बात नहीं करता था। अमीरों में जो एक बेदर्दी और उद्दण्डता होती है , इसमें उसे भी प्रचुर भाग मिला था। नौकर ने बिस्तर लगाने में जरा भी देर की , दूध जरूरत से ...