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गीत - हवा में ही गूँज रहे जवाब / बॉब डिलन Song - Blowin' In The Wind / Bob Dylan

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हवा में ही गूँज रहे जवाब / बॉब डिलन अनुवाद - अमित सन्तोष मिश्र किसी मनुष्य को तुम मनुष्य मान सको इसके लिए उसे कितना लम्बा सफ़र तय करना होगा एक सफ़ेद कबूतर रेत के भीतर शान्ति से सो सके इसके लिए उसे कितने समन्दर पार करने होंगे हाँ , तोपों के मुँह से कितने गोले निकलेंगे इससे पहले कि तुम हमशा के लिए उन पर रोक लगा सको इनके जवाब , मेरे दोस्त , हवा में ही गूँज रहे हवा में ही गूँज रहे सब जवाब हाँ , एक पहाड़ कितने बरसों तक खड़ा रहेगा समन्दर में पूरी तरह धुल जाने से पहले हाँ , कितने सारे लोग कितने बरसों तक जिएँगे आज़ाद होने की इजाज़त मिलने से पहले और एक आदमी कब तक अपना सिर हिलाता रहेगा यह स्वांग करते हुए कि उसे कुछ दिख नहीं रहा ? आसमान देख सके , इसके लिए कोई आदमी कितनी बार अपना सिर उठाएगा लोगों का रुदन सुन सके , इसके लिए कितने कान होने चाहिए एक आदमी के पास कितनी मौतें होनी चाहिए यह जानने के लिए कि बहुत लोग मारे जा चुके इनके जवाब , मेरे दोस्त , हवा में ही गूँज रहे मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद  : अमित सन्तोष मिश्र अब यह गीत मूल अँग्रे...

व्‍यंग्‍य कविता : रामलला हम आएँगे, मन्दिर वहीं बनाएँगे / जगदीश सौरभ

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व्‍यंग्‍य कविता : रामलला हम आएँगे, मन्दिर वहीं बनाएँगे जगदीश सौरभ  हिटलर के वारिस (वायरस?) संघी हाफपैंटियों ने 2014 का चुनाव अच्छे दिनों के वायदे पर लड़ा था। लोगों को रोजगार देने , अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने , काला धन वापस लाने और भ्रष्टाचारियों को सजा देने के वायदे किए गए थे लेकिन पांचवा साल आते आते उनकी असलियत अब जनता के सामने आ गई है। विकास के वायदे हवा हो गए हैं और राम मंदिर एक बार फिर सेंटर स्टेज पर आ गया है। कभी गाय के नाम पर तो कभी मंदिर के नाम पर दंगे करवा कर लगातार देश में हिंदू मुस्लिम तनाव को बनाए रखना इनकी पुरानी रणनीति है। जगदीश सौरभ ने इस पर एक बेहतरीन व्यंग्य कविता लिखी है। यह अवधी में है लेकिन हिंदी समझने वाले ज्यादातर लोग इसको समझ ही जाएंगे। पढ़ें और आगे बढ़ाएं। रामलला हम आएँगे , मन्दिर वहीं बनाएँगे जे सरवा सिरि राम न बोली , पकड़-पकड़ लतियाएँगे रामलला हम आएँगे पढ़े बदे इस्कूल ना रहै , घर चौका औ चूल्ह ना रहै रोटी औ रोजगार ना रहै , कउनो कारोबार ना रहे अपने खूब मलाई काटें , लम्बा-लम्बा भाषण छाँटैं गाय-भईंस के नाम पे हरदम , जनता को लड्वाएँगे ...

सआदत हसन मंटो की कहानी - टोबा टेकसिंह Story - Toba Tek Singh / Saadat Hasan Manto

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सआदत हसन मंटो की कहानी - टोबा टेकसिंह बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए , यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय। मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल , दानिशमंदों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कांफ्रेंसें हुई और िदन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छान बीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिकीन (सम्बन्धी ) हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये। उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चीमेगोइयां होने लगी। ...

स्‍मृतियों की जगह / कविता कृष्‍णपल्‍लवी

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स्‍मृतियों की जगह  कविता कृष्‍णपल्‍लवी लोर्का एक बार जब कहीं कविता पढ़कर मंच से नीचे उतरे तो एक बूढ़ी देहाती औरत ने उन्‍हें पकड़ लिया। उस औरत ने अपने बटुए से निकालकर एक पीली पुरानी तस्‍वीर दिखाई जो उनके बचपन की थी। उस औरत ने बताया कि उनके पैदा होते समय उनकी अकेली माँ की मदद के लिए वही पास में मौजूद थी। इस घटना की याद लोर्का को हमेशा भावविह्वल कर देती थी। पाब्‍लो नेरूदा के बचपन की एक याद। उनके घर के पिछवाड़े एक फेंस लगा हुआ था। उस फेंस के एक सूराख से एक दिन एक छोटे से हाथ ने उन्‍हें एक खिलौने वाला मेमना भेंट किया। फिर उन्‍होंने अपना प्‍यारा चीड़ का गुलदस्‍ता उस बच्‍चे को भेंट कर दिया। उपहारों का यह रहस्‍मय विनिमय उनकी याददाश्‍त में गहराई तक पैठ गया और इस घटना से उन्‍हें यह समझने में मदद मिली कि आप यदि मानवता को कुछ भी दें तो बदले में और भी खूबसूरत चीज़ें पायेंगे। ऐसी छोटी-छोटी घटनाएँ , सम्‍भव है , हमारे-आपके जीवन में भी घटित होती हों। पर हम उन्‍हें बहुत दिनों तक याद नहीं रख पाते। घटनाएँ अपने तात्‍कालिक प्रभाव के अतिरिक्‍त हमारे लिए कोई मायने नहीं रखतीं। स्‍मृतियाँ ...

गाब्रिएल गार्सिया मार्केज की कहानी - ऐसे ही किसी दिन Story - One of These Days / Gabriel Garcia Marquez

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गाब्रिएल गार्सिया मार्केज की कहानी - ऐसे ही किसी दिन अनुवाद – मनोज पटेल आठ बजे के बाद खिड़की से आसमान को देखने के इरादे से , वह थोड़ी देर के लिए रुका और उसने देखा कि दो विचारमग्न बाज बगल के मकान की शहतीर पर धूप ले रहे थे। वह इस खयाल के साथ फिर काम में जुट गया कि दोपहर के खाने के पहले फिर से बारिश होगी। अपने ग्यारह वर्षीय बेटे की तेज आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ।उस सोमवार की सुबह , गर्म और बिना बारिश वाली हुई। तड़के जागने वाले औरेलियो एस्कोवार ने , जो दाँतों का बिना डिग्री वाला डाक्टर था , अपना क्लीनिक छह बजे ही खोल दिया। उसने शीशे की आलमारी से नकली दाँत निकाले , जो अब भी खड़िया-मिट्टी के साँचे में जड़े हुए थे , और मुट्ठी भर औजारों को उनके आकार के क्रम में मेज पर यूँ सजा के रखा जैसे उनकी नुमाइश की जा रही हो। उसने बिना कालर वाली एक धारीदार कमीज पहन रखी थी जिसके बंद गले पर सुनहरा बटन था , और उसकी पैंट गेलिस से बँधी हुई थी। वह दुबला-पतला सींकिया इनसान था जिसकी निगाह कभी-कभार ही हालात के अनुरूप हो पाती थी , जैसा कि बहरे लोगों की निगाहों के मामले में होता है। औजारों को मेज पर ...