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शशिप्रकाश की कविता - स्पेंग्लर का रोना और कुकनूस का गाना

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शशिप्रकाश की कविता - स्पेंग्लर का रोना और कुकनूस का गाना और उन्होंने कहा कि लड़ना , यह शब्द पुराना पड़ चुका है , कि इसके नतीजे टिकाऊ नहीं रहे हैं और कि इसमें निहित है मानवीय मूल्यों का निषेध। इसकी जगह होना चाहिये जीवन और चिन्तन में कोई शब्द न लड़ने का अर्थ लिये हुए। सोचता रहा मैं ? लड़ने की क्रिया की प्राचीनता के बारे में , लड़ने और लड़ने के बीच के फ़र्क के बारे में और यह कि न लड़ना भी उतनी ही पुरानी आदत है जितना कि लड़ना। और फि़र यह कि जीवन भी तो उतना ही पुराना है! किस विधि से करें जीवन का मानवीय निषेध ? शब्द वह कौन-सा होगा जीवन का स्थानापन्न ? और यह भी कि प्रयोजन को हटाकर क्यों हो रही हैं लड़ने-न लड़ने की बातें ? सोचता हूँ उस निर्जन द्वीप पर एकाकी मृत्यु का आलिंगन करने से पूर्व वेजालियास( 1) क्या सोचता रहा होगा और अग्नि में प्रवेश करने से पहले ब्रूनो( 2) के दिमाग में आखि़री विचार क्या आया था ? उधर कोहेकाफ़( 3) अभी भी उतना ही ख़ूबसूरत बना हुआ है। सहस्त्राब्दी का अन्त आ रहा है। दूर से सुनायी दे रहा है स्पेंग्...

महान लेखक बर्तोल्त ब्रेख्त की कुछ फासीवाद/दमन विरोधी रचनाएं

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महान लेखक बर्तोल्त ब्रेख्त   की कुछ फासीवाद/दमन विरोधी रचनाएं फिर भी तुम खामोश हो बदकिस्मत लोगो तुम्हारे भाई पर मार पड़ रही है और तुमने आँखों पर पट्टी बाँध ली है उसे पीटा जा रहा है   फिर भी तुम खामोश हो जंगली जानवर टोह में घूम रहा है और तुम कहते हो उसने हमें छोड़ दिया क्योंकि हमने विरोध नहीं किया यह कैसा है शहर   तुम किस तरह के जीव हो ? जब ज़ुल्म हो तब बगावत होनी चाहिए शहर में और अगर बगावत न हो तो बेहतर होगा   कि रात होने से पहले ही शहर जल कर राख हो जाए जब फ़ासिस्ट मज़बूत हो रहे थे अंग्रेजी से अनुवादः रामकृष्ण पाण्डेय जर्मनी में जब फासिस्ट मजबूत हो रहे थे और यहां तक कि मजदूर भी बड़ी तादाद में उनके साथ जा रहे थे हमने सोचा हमारे संघर्ष का तरीका गलत था और हमारी पूरी बर्लिन में लाल बर्लिन में नाजी इतराते फिरते थे चार-पांच की टुकड़ी में हमारे साथियों की हत्या करते हुए पर मृतकों में उनके लोग भी थे और हमारे भी इसलिए हमने कहा पार्टी में साथियों से कहा वे हमारे लोगों की जब...

कुछ बेतरतीब उद्धरण

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बलवान समाज वही होता है, जिसकी तरुणाई सबल होती है, जिसमें मृत्यु को वरण करने की क्षमता होती है, जिसमें भविष्य के सपने होते हैं और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, वही तरुणाई है। महादेवी वर्मा _________________________ उन चीज़ों के लिए जान देना सार्थक है जिन चीज़ों के बिना जीना सार्थक नहीं होता। एदुआर्दो गालियानो _________________________ मैं असम् ‍ पृक् ‍ त व् ‍ यक्ति से घृणा करता हूँ। मेरा विश् ‍ वास है कि ज़ि ‍ न् ‍ दा होने का मतलब होता है पक्ष चुनना। जो वास् ‍ तव में ज़ि ‍ न् ‍ दा हैं वे एक नागरिक और एक पक्षधर व् ‍ यक्ति होने से बच नहीं सकते। असम् ‍ पृक् ‍ तता और उदासीनता जीवन नहीं है, बल्कि परजीविता और मनोविकृति है। अन् ‍ तोनियो ग्राम् ‍ शी _________________________ सूअर से कभी भी कुश्ती मत लड़ो। तुम गंदे हो जाओगे, और इसके अलावा, सूअर यह पसंद करता है। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ _________________________ तुम प्रेरणा का इंतज़ार नहीं कर सकते। तुम्हें लट्ठ लेकर इसके पीछे भागना होगा। जैक लंडन _________________________ "बात यह ह...

कहानी - पक्षी और दीमक / गजानन माधव मुक्तिबोध

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कहानी - पक्षी और दीमक / गजानन माधव मुक्तिबोध बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बंद खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ, दीवार से लग कर, काँटेदार बेंत की हरी-घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़ कर फैल गई है और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखनेवालों को लगेगा कि वे उस बेल के फूल नहीं, वरन बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं। किंतु इससे भी आश् ‍ चर्यजनक बात यह है कि उस लता ने अपनी घुमावदार चाल से न केवल बेंत की डालों को, उनके काँटों से बचते हुए, जकड़ रखा है, वरन उसके कंटक-रोमोंवाले पत् ‍ तों के एक-एक हरे फीते को समेट कर, कस कर, उनकी एक रस् ‍ सी-सी बना डाली है; और उस पूरी झाड़ी पर अपने फूल बिखराते-छिटकाते हुए, उन सौंदर्य-प्रतीकों को सूरज और चाँद के सामने कर दिया है। लेकिन, इस खिड़की को मुझे अकसर बंद रखना पड़ता है। छत् ‍ तीसगढ़ के इस इलाके में, मौसम-बेमौसम आँधीनुमा हवाएँ चलती हैं। उन् ‍ होंने मेरी खिड़की के बंद पल् ‍ लों को ढीला कर ड...