शशिप्रकाश की कविता - स्पेंग्लर का रोना और कुकनूस का गाना
शशिप्रकाश की कविता - स्पेंग्लर का रोना और कुकनूस का गाना और उन्होंने कहा कि लड़ना , यह शब्द पुराना पड़ चुका है , कि इसके नतीजे टिकाऊ नहीं रहे हैं और कि इसमें निहित है मानवीय मूल्यों का निषेध। इसकी जगह होना चाहिये जीवन और चिन्तन में कोई शब्द न लड़ने का अर्थ लिये हुए। सोचता रहा मैं ? लड़ने की क्रिया की प्राचीनता के बारे में , लड़ने और लड़ने के बीच के फ़र्क के बारे में और यह कि न लड़ना भी उतनी ही पुरानी आदत है जितना कि लड़ना। और फि़र यह कि जीवन भी तो उतना ही पुराना है! किस विधि से करें जीवन का मानवीय निषेध ? शब्द वह कौन-सा होगा जीवन का स्थानापन्न ? और यह भी कि प्रयोजन को हटाकर क्यों हो रही हैं लड़ने-न लड़ने की बातें ? सोचता हूँ उस निर्जन द्वीप पर एकाकी मृत्यु का आलिंगन करने से पूर्व वेजालियास( 1) क्या सोचता रहा होगा और अग्नि में प्रवेश करने से पहले ब्रूनो( 2) के दिमाग में आखि़री विचार क्या आया था ? उधर कोहेकाफ़( 3) अभी भी उतना ही ख़ूबसूरत बना हुआ है। सहस्त्राब्दी का अन्त आ रहा है। दूर से सुनायी दे रहा है स्पेंग्...