ज्ञानरंजन की कहानी - फ़ेंस के इधर और उधर
ज्ञानरंजन की कहानी - फ़ेंस के इधर और उधर हमारे पड़ोस में अब मुखर्जी नहीं रहता। उसका तबादला हो गया हैं। अब जो नए आए हैं , हमसे कोई वास्ता नहीं रखते। वे लोग पंजाबी लगते हैं या शायद पंजाबी न भी हों। कुछ समझ नहीं आता उनके बारे में। जब से वे आए हैं उनके बारे में जानने की अजीब झुंझलाहट हो गई हैं। पता नहीं क्यों मुझसे अनासक्त नहीं रहा जाता। यात्राओं में भी सह-यात्रियों से अपरिचित नहीं रहता। शायद यह स्वभाव हैं लेकिन हमारे घर में कोई भी उन लोगों से अनासक्त नहीं है। हम लोग इज्ज़तदार हैं। बेटी-बहू का मामला , सब-कुछ समझना पड़ता है। इसलिए हम लोग हमेशा समझते रहते हैं। उत्सुक रहते हैं और नए पड़ोसी की गतिविधियों का ‘इम्प्रेशन ' बनाते रहते हैं। मैं उन्हें सपरिवार अपने घर बुलाना चाहता हूँ , उनके घर आना-जाना चाहता हूँ। पर उन लोगों को मेरी भावनाओं की संभावना भी महसूस नहीं होती शायद। उनका जीवन सामान्य क़िस्म का नहीं है। वे अपने बरामदे के बाहर वाली कठोर भूमि के हिस्से पर कुर्सियाँ डाल दिन के काफ़ी समय बैठे रहते हैं। उनकी ये कुर्सियाँ हमेशा वहीं पड़ी रहती है। रात को भी। वे लापरवाह लोग हैं , लेकिन उनक...