महँगाई के मार्क्सवादी विश्‍लेषण के बाबत सोशल मीडिया के "वामपंथी" पत्रकार महोदय के मूर्खतापूर्ण कुतर्क

'यूरेका! यूरेका!' -- सोशल मीडिया के "वामपंथी" पत्रकार महोदय ने फिर चमत्कृत कर दिया अपनी नयी खोज से!!

कविता कृष्‍णपल्लवी


सोशल मीडिया के ‘’वामपंथी’’ पत्रकार महोदय फिर से एक नयी खोज लेकर आए हैं। उन्होंने बताया है कि अप्रैल में कुल थोक महँगाई बढ़कर 10.5 प्रतिशत हो गयी है। उनका दावा है कि यह महँगाई इजारेदार पूँजी द्वारा वसूले जाने वाले ट्रिब्यूट (इजारेदार लगान) और अप्रत्यक्ष करों के बढ़ने के कारण बढ़ी है। इसके बाद उन्होंने इशारतन हम पर हमला करते हुए दावा किया है कि हम इजारेदार पूँजी के आने से खाद्यान्न के सस्ते होने का इन्तज़ार कर रहे हैं! पूरे मसले की अवसरवादी प्रस्तुति कर ऐसे “बौद्धिक” बहुरूपिये अपने मूर्खतापूर्ण कुतर्कों को सही साबित करने का प्रयास करते हैं। तो आइये जाने लेते हैं कि मूर्खेश असीम ने यहाँ क्या द्रविड़ प्राणायाम किये हैं।

1. 10.5 प्रतिशत महँगाई केवल खाद्यान्न की महँगाई नहीं है। कुछ खाद्य वस्तुओं की थोक महँगाई मार्च से अप्रैल में 3.2 प्रतिशत से बढ़कर 4.9 प्रतिशत हो गयी, लेकिन उनकी खुदरा महँगाई घटी है, जिस पर कुछ आगे आऊँगी। लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मूर्खेश असीम को यह नहीं पता है कि 2017 से जारी थोक कीमत सूचकांक में अप्रत्यक्ष करों की गणना शामिल नहीं होती है। थोक कीमत सूचकांक में फैक्ट्री गेट पर पूँजीपति की उत्पादन लागत तथा उद्यमी मुनाफा शामिल होता है, लेकिन अप्रत्यक्ष कर उसमें शामिल नहीं किये जाते! इसी को कहते हैं अंधबुड़िया तुक्के मारना! ज़रा सोचिये: यह व्यक्ति सोशल मीडिया पर आर्थिक मसलों का जानकार बना घूमता है और तमाम असावधान पाठक इसके झाँसे में भी आ जाते हैं। इस मसले को समझने के लिए, पढ़ें यह ख़बर: https://www.thehindu.com/opinion/columns/getting-the-numbers-right/article18474943.ece

यही वजह है कि कुछ खाद्य वस्तुओं के थोक कीमत सूचकांक में बढ़ोत्तरी के बावजूद कुल खुदरा कीमत सूचकांक में गिरावट आई, जिसका मुख्य कारण था कई अन्य भोजन वस्तुओं की कीमतों में आई गिरावट। पढ़ें यह ख़बर: https://www.businesstoday.in/current/economy-politics/retail-inflation-rises-to-429-in-april-2021/story/438912.html

जहाँ तक खाद्यान्न खुदरा उपभोक्ता कीमत सूचकांक का प्रश्न है, वह मार्च के 4.87 प्रतिशत से घटकर 2.02 प्रतिशत हो गया। लेकिन मूर्खेश असीम नामक इस पैस्सिव रैडिकल बुद्धिजीवी को अपने अपार्टमेण्ट के नीचे दाल ख़रीदकर हर सच्चाई का अहसास हो जाता है! बहरहाल, इसका यह अर्थ नहीं है कि यह खाद्यान्न खुदरा सूचकांक बढ़ नहीं सकता, लेकिन उसका कारण इजारेदार कम्पनियों द्वारा वसूला जा रहा इजारेदार लगान नहीं है, बल्कि अन्य कारण होते हैं, जिन पर मैं आगे आऊँगी।

2. दूसरी बात, हमारी बहस में यह मसला था ही नहीं कि आम तौर पर इजारेदार पूँजी अन्य सभी सेक्टरों में इजारेदार लगान (इजारेदार कीमतों द्वारा) वसूलकर महँगाई बढ़ाती हैं या नहीं। मज़दूरी उत्पादों (wage goods) को छोड़कर अन्य सेक्टरों में तो इजारेदार कम्पनियांँ इजारेदार कीमतों के ज़रिये इजारेदार लगान वसूलकर महँगाई को बढ़ाती ही हैं। बहस केवल मज़दूरी उत्पाद (wage goods) के सेक्टरों को लेकर है। उसमें एक सामान्य प्रवृत्ति के तौर पर इजारेदार पूँजी इजारेदार लगान के ज़रिये महंगाई नहीं बढ़ा सकती है क्योंकि यह उसके भी और पूरे पूँजीपति वर्ग के भी विरुद्ध जाता है, क्योंकि यह मज़दूरी में बढ़ोत्तरी करता है। लाभकारी मूल्य (MSP) आज यही कर रहा है और इसी को बचाने के लिए मूर्खेश असीम और ‘यथार्थ’ पत्रिका की बौड़म ब्रिगेड बदहवास घूम रही है, कभी कव्वालियांँ गा रही है, तो कभी रुदालियों के समान छाती पीट रही है! आइये देख लेते हैं कि मार्क्स व लेनिन का इस मुद्दे पर क्या विचार है। मार्क्स बताते हैं:

“If the commodity with the monopoly price is part of the workers' necessary consumption, it increases wages and thereby reduces surplus-value, as long as the workers continue to receive the value of their labour-power. It could press wages down below the value of labour-power, but only if they previously stood above the physical minimum. In this case, the monopoly price is paid by deduction from real wages (i.e. from the amount of use-values that the worker receives for the same amount of labour) and from the profit of other capitalists.” (Marx, Capital, Volume 3, Penguin Edition, p. 1001)

इसी प्रकार लेनिन काउत्स्की के ‘एग्रेरियन क्वेश्चन’ से उन्हें अनुमोदन के साथ उद्धृत करते हुए कहते हैं:

“To proceed: the second distinction between differential rent and absolute rent is that the former is not a constituent part affecting the price of agricultural produce, whereas the latter is. The former arises from the price of production; the latter arises from the excess of market price over price of production. The former arises from the surplus, from the super-profit, that is created by the more productive labour on better soil, or on a better located plot. The latter does not arise from the additional income of certain forms of agricultural labour; it is possible only as a deduction from the available quantity of values for the benefit of the landowner, a deduction from the mass of surplus value—therefore, it implies either a reduction of profits or a deduction from wages. If the price of foodstuffs rises, and wages rise also, the profit on capital diminishes. If the price of foodstuffs rises without an increase in wages, then the workers suffer the loss. Finally, the following may happen— and this may be regarded as the general rule—the loss caused by absolute rent is borne jointly by the workers and the capitalists.” (Lenin, Collected Works, Volume 13, Progress Publishers, Moscow, p. 299)



कहने की आवश्यकता नहीं कि लाभकारी मूल्य स्वयं निरपेक्ष भूमि लगान नहीं है, बल्कि इजारेदार कीमत द्वारा पैदा होने वाला एक अन्य प्रकार का इजारेदार लगान है, लेकिन उपरोक्त बात सभी प्रकार के इजारेदार लगानों पर लागू होती हैं, क्योंकि वह कीमतों की बढ़ोत्तरी पर आधारित होता है। यही वजह है कि लाभकारी मूल्य खाद्यान्नों को महँगा बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। लेकिन आप ‘यथार्थ’ की बौड़म ब्रिगेड के विचारों को खुद ही देख सकते हैं कि वे मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के बुनियादी ज्ञान से भी किस प्रकार रिक्त और वंचित हैं। इसमें कोई ताज्जुब भी नहीं है: जब भूतपूर्व एसयूसीआई पैस्सिव रैडिकल ‘’बुद्धिजीवी’’ और पटना के दोन किहोते जैसे राजनीतिक अपढ़ इकट्ठा होकर पत्रिका निकालेंगे, तो किस प्रकार का आतंकवाद फैलेगा, यह देखा ही जा सकता है। इसीलिए हमने पहले भी सभी संजीदा पाठकों को चेताया है, कि ‘यथार्थ’/’दि ट्रूथ’ पत्रिका के अज्ञान-प्रसार अभियान से सावधान रहें। ये मार्क्सवाद के नाम पर मूर्खतापूर्ण बातों और अज्ञान का कचरा लगातार सोशल मीडिया पर बरसा रहे हैं और तमाम संजीदा नौजवान और पाठक जो मार्क्सवाद में दिलचस्पी रखते हैं, वे इन “बौद्धिक” बहुरूपियों के चक्कर में आकर मूर्ख बन जा रहे हैं। आगे बढ़ते हैं।

3. तीसरी बात यह है कि मौजूदा समय में खाद्यान्न की महँगाई बढ़ने का प्रमुख कारण स्वयं भारत के पूँजीपतियों ने बताया है। पढ़ें यह ख़बर: https://www.thehindu.com/business/wpi-inflation-hits-high-of-105/article34582231.ece कुछ मामलों में पूँजीपति बिल्कुल सच बोलते हैं! मूल कारण है पेट्रोल उत्पादों की बढ़ती महँगाई। हम जानते हैं कि कुछ उत्पादों व सेवाओं की कीमतें लगभग सभी मालों के उत्पादन की लागत में शामिल होती हैं और इसलिए उनकी कीमतों को भी बढ़ाती हैं। इनमें पेट्रोलियम उत्पाद, बिजली आदि प्रमुख हैं। पेट्रोलियम उत्पादों व बिजली की महंगाई के कारण फैक्टरी गेट पर जो ‘उत्पादन लागत + उद्यमी मुनाफ़ा’ आकलित होता है, उसी के आधार पर थोक कीमत सूचकांक का आकलन होता है। इसमें उत्पादों पर लगने वाले अप्रत्यक्ष कर शामिल नहीं होते, जैसा कि ‘यथार्थ’ बौड़म ब्रिगेड के बॉस मूर्खेश असीम को लगता है। लेकिन यदि पेट्रोल, डीज़ल, बिजली आदि की कीमतों में बढ़ोत्तरी होती है, तो उत्पादन की लागत बढ़ती है। यही कारण है कि इन उत्पादों के महँगे होने पर सभी वस्तुएंँ व सेवाएंँ महँगी होती हैं, जिसमें कि स्वयं खाद्यान्न उत्पाद भी शामिल होते हैं। ये कर वास्तव में राज्यसत्ता द्वारा वसूला जा रहा ‘ट्रिब्यूट’ हैं, जिन पर बड़ा पूँजीपति वर्ग स्वयं खुश नहीं है! लेकिन हमारे मूर्खेश असीम और उनकी बौद्धिक बौना मण्डली (‘यथार्थ’ पत्रिका) की आदत है कि या तो वे अपने दावों के लिए कोई ठोस आँकड़े व तथ्य पेश ही नहीं करते हैं, या फिर आधे-अधूरे आँकड़ों को थर्ड डिग्री टॉर्चर देकर उनसे अपनी “मन की बात” बुलवाते हैं! इसीलिए मेरा सभी संजीदा पाठकों विशेष कर मार्क्सवाद में रुचि रखने वाले पाठकों से फिर से आग्रह है कि ‘यथार्थ’ पत्रिका नामक इस हानिकारक अज्ञान-प्रसारण कारखाने से दूर रहें; जितना दूर रहेंगे, उनके बौद्धिक स्वास्थ्य और कुशल-मंगल के लिए उतना ही अच्छा होगा।

4. यह बात भी समझने योग्य है जो मूर्खेश असीम और ‘यथार्थ’ पत्रिका की मूर्ख-मण्डली को समझ नहीं आती। इजारेदार पूँजी खाद्यान्न व अन्य मज़दूरी उत्पादों के सेक्टर में इजारेदार लगान वसूल करके महँगाई को नहीं बढ़ाती है, इसका यह अर्थ नहीं है कि पूँजीवादी व्यवस्था में अन्य कारणों से मज़दूरी उत्पादों की भी महँगाई नहीं बढ़ती है। पूँजीपति वर्ग का पूँजीवादी अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण नहीं होता है! वह पूँजी की नियमबद्ध गति के मुताबिक काम करती है। इसीलिए मार्क्स ने कहा था कि पूँजीवादी व्यवस्था में अनियमितताओं के ज़रिये एक नियमितता का सतत् पुनरुत्पादन होता रहता है। इन अनियमितताओं पर पूँजीपति वर्ग का भी कोई पूर्ण नियंत्रण नहीं होता। बहुत-से कारणों से मज़दूरी उत्पाद की भी महँगाई बढ़ती है। मसलन, व्यापारिक पूँजीपति वर्ग की जमाखोरी और कालाबाज़ारी तथा सट्टेबाज़ी के कारण भी महँगाई बढ़ सकती है। इस प्रश्न पर व्यापारिक पूँजीपति वर्ग और बड़े इजारेदार वित्तीय-औद्योगिक पूँजीपति वर्ग के बीच अक्सर ही कशमकश जारी रहती है। साथ ही, कई तात्कालिक बाज़ार कारकों के कारण मज़दूरी उत्पादों की महँगाई भी बढ़ती है और यह पूँजीपति वर्ग की इच्छा या नियंत्रण में नहीं होता है। इसलिए जब भी महँगाई बढ़ेगी, तो मूर्खेश असीम का इस पर चीख़कर बदहवास हो उठना कि “देखो, देखो, इजारेदार पूँजी ने ट्रिब्यूट वसूल करके खाद्यान्न की कीमत बढ़ा दी” एक हास्यास्पद हरक़त है! ऐसे लोगों को मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र का इमला भी नहीं आता है। इसीलिए फिर से चेतावनी: इन मूर्खों से और उनके हास्यास्पद “बौद्धिक” उपक्रम ‘यथार्थ’ पत्रिका से पाठक व मार्क्सवाद में दिलचस्पी रखने वाले संजीदा लोग जितनी सुरक्षित दूरी बनाए रखेंगे, उनके लिए उतना ही अच्छा होगा।

5. आखिरी बात, पूँजीपति वर्ग जब मुनाफे के संकट से ग्रस्त होता है और वह अन्य किसी तरीके से मुनाफे की दर को नहीं बढ़ा पाता, तो वह वास्तविक मज़दूरी को डिप्रेस करता है। नतीजा होता है बुनियादी आवश्यकताओं की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी। यह कोई इजारेदार लगान के कारण पैदा होने वाली महँगाई नहीं है। इतना तो मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के शुरुआती विद्यार्थी भी समझ जाएंँगे। कुछ समय पहले हमारे किसी साथी ने ‘यथार्थ’ बौद्धिक बौड़म ब्रिगेड को कम-से-कम रंगनायकम्मा की पुस्तक ‘बच्चों के लिए अर्थशास्त्र’ पढ़ लेने की सलाह दी थी। मैं इस सलाह को बिल्कुल सही मानती हूँ।

जब भी कोई मार्क्सवादी महँगाई में होने वाली बढ़ोत्तरी का अध्ययन करता है, तो वह इन सभी बुनियादी कारकों का अध्ययन करता है। लेकिन हमारे मूर्खेश असीम जी को लगा कि थोक खाद्यान्न महँगाई बढ़ने से उनकी बात साबित हो गयी, ऊपर से उन्होंने दाल भी महँगी ख़रीदी थी, (अक्सर मध्यवर्गीय चुक्कड़ ख़रीदारों की शकल देखकर ही दुकानदारों के मन में यह ख़याल आता है, “आ गया वह जिसका इन्तज़ार था!”), कि इजारेदार कम्पनियों के इजारेदार लगान या ‘ट्रिब्यूट’ के कारण यह महंगाई बढ़ी है! न तो उन्होंने पूरे मसले का गहराई से अध्ययन किया न जांँच-पड़ताल की। मार्क्सवादी विश्लेषण की तो हम उनसे उम्मीद भी नहीं करते हैं! अगर सामान्य नागरिक के तौर पर ठीक से पढ़ाई-लिखाई की होती, तो इतनी दयनीय स्थिति नहीं होती।

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