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बेर्टोल्ट ब्रेष्ट के एकमात्र संपूर्ण उपन्यास ‘तीन टके का उपन्यास' की पीडीएफ फाइल PDF file of Bertolt Brecht's Only Finished Novel - ThreePenny Novel

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बेर्टोल्ट ब्रेष्ट के एकमात्र संंपूर्ण उपन्यास ‘तीन टके का उपन्‍यास' की पीडीएफ फाइल  PDF file of Bertolt Brecht's Only Finished Novel - ThreePenny Novel हिन्‍दी पीडीएफ फाइल डाउनलोड लिंक   Link for English PDF File - (Translation from German by Desmond I. Vesey) डाउनलोड करने में कोई समस्‍या आये तो 9892808704 पर व्‍हाटसएप्‍प संदेश भेजें इस पुस्तक के बारे में   ‘ तीन टके का उपन्यास’ दरअसल बेर्टोल्ट ब्रेष्ट के प्रसिद्ध ‘थ्री पेनी ऑपेरा’ का ही एक विस्तृत और व्यापक संस्करण है। स्वयं ‘थ्री पेनी ऑपेरा’ ब्रिटिश नाटककार जॉन गे द्वारा लिखित ‘बेगर्स ऑपेरा’ पर आधारित था। जॉन गे ने ‘बेगर्स ऑपेरा’ नामक अपनी प्रसिद्ध रचना 1728 में लिखी थी। उस नाटक के सभी केन्द्रीय चरित्र , जैसे मैकहीथ (‘मैक दि नाइफ’) , पीचम , जेनी , पॉली , आदि , सभी ब्रेष्ट के ‘थ्री पेनी ऑपेरा’ में थे। 1928 में ब्रेष्ट ने ‘थ्री पेनी ऑपेरा’ को पूरा किया। 1934 में उन्होंने इन्हीं चरित्रों और उसी कहानी को लेकर ‘थ्री पेनी नॉवेल’ यानी , ‘ तीन टके का उपन्यास’ लिखा। यह उपन्यास ‘थ्री पेनी ऑपेरा’ से कहीं ज़्यादा व्यापक स्वरूप ग्...

क‍व‍िता - हम जनता हैं / अल्वी सिनेर्वों

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क‍व‍िता - हम जनता हैं   अल्वी सिनेर्वों जब मेरे बेटे का जन्म हुआ था , मुझमें बेहद लड़कपन था। झुकी मैं उसकी आँखों में झाँकने के लिए हज़ार माताओं ने झाँका मेरे साथ सारे आतंक मौजूद थे और जैसे काफी के बुरादे से भविष्य पढ़ती बूढ़ी औरत मैंने देखा वह जो घटित होने वाला था। बाहर हो रहा था ध्वनित ग्रीष्म और गा रही थी चिड़िया। वह था जमाना स्वास्तिकों का , फौजी बूटों का। मैं ही नहीं थी अकेली जो अपने बच्चे को छोड़ने पर मज़बूर हुई सिर्फ मैं ही नहीं थी जिसे उठा ले जाया गया। हम बहुत सारे थे और कई देशों में , घबराहट से भरी , जल्दबाज़ी में बच्चों को सहलाती आंसुओं के घूँट पीती हुई अपने चेहरों को दूसरी ओर करती माताएँ। हज़ार रातों और दिनों के बाद मैं वापस लौटी , हर बार हत्यतित , कई देशों में , फाँसी दी हुई , गोलियों से दागी हुई , गैस की कोठरियों में दम घुटी हुई , भस्म कर दी गयी और भस्मि से उठ खड़ी हुई जीवित अंतहीन माँ , जन्मदान के आनन्द से भरपूर। मैं वापस लौटी बिल्कुल परिवर्तित , पवित्र और निरातंकित । आज मेरी अगण्य सन्तानें हैं वे फूट रही हैं कोंपलों की तरह खंडहरों में वे हरेक झोपड़ी ...

भाषा के प्रश्न पर एक अनौपचारिक वार्ता

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भाषा के प्रश्न पर एक अनौपचारिक वार्ता शशि प्रकाश ( एक अनौपचारिक बातचीत का टेप किया गया अंश) भाषा का पतन दरअसल विचारों का पतन होता है। भाषाहीनता विचारहीनता की स्थिति होती है। उधार के विचार अनुवाद जैसी भाषा में प्रकट होते हैं। आडम्बरी लोगों की सजी-सँवरी भाषा भी बनावटी , खोखली और उबाऊ होती है। मौलिक विचार मौलिक भाषा में सामने आते हैं। यथार्थ के संधान और अन्वेषण में भटकते व्यक्ति की भाषा आभासी तौर पर अनगढ़ और भटकती हुई लगती है , पर फिर भी आकर्षक और आत्मीय प्रतीत होती है। सच्चा रचनाकार कभी अपनी अभिव्यक्ति से संतुष्ट नहीं होता। उसे कहीं कुछ अधूरा , कुछ छूट गया-सा महसूस होता रहता है। जो स्वाभाविक तौर पर अपनी भाषा में नहीं सोचते और नहीं लिखते , वे कभी भी न मौलिक चिन्तक हो सकते हैं और न ' जनता का आदमी ' । यह सही है कि यथासम्भव सरल भाषा में लिखना चाहिए , लेकिन सरलता का अतिरेकी आग्रह भाषा को अगर टकसाली और टपोरी बनाने तक चला जाए , तो यह समाज में विचारों की जगह को और अधिक संकुचित करता चला जायेगा। कोई दार्शनिक या वैचारिक बात यदि जटिल और अमूर्त है , तो लाख कोशिश के बावजूद भाषा में भी क...

कहानी - रेगिस्तान की माया / ओनोरे द बाल्ज़ाक Story - A Passion in the Desert / Honore De Balzac

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  कहानी - रेगिस्तान की माया ओनोरे द बाल्ज़ाक For English version please scroll down  बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में, साहित्य के जागरूक यूरोपीय पाठकों के बीच यह मान्यता काफ़ी लोकप्रिय हुआ करती थी कि विश्व का महानतम उपन्यास “युद्ध और शान्ति” है और महानतम उपन्यासकार  बाल्‍ज़ाक  हैं। आज, एक शताब्दी बाद भी, विश्व–साहित्य के अध्येताओं का बहुलांश उपरोक्त धारणा से सहमत मिलेगा। पिछले डेढ़ सौ वर्षों के दौरान दुनिया के पाँच सार्वकालिक महानतम उपन्यासकारों की सूची जब कभी भी बनाई जाती तो उसमें  बाल्‍ज़ाक  का नाम शायद सबसे निर्विवाद और सुरक्षित होता। बाल्‍ज़ाक का विस्‍तृत परिचय पढ़ने के लिए इस लिंक पर जरूर क्लिक करें -  इक्कीसवीं सदी में बाल्ज़ाक -------------------------------- पशुशाला से बाहर आते ही उस महिला ने कहा , " कैसा भयानक दृश्य है ?" अब तक वह पिंजड़े के भीतर खिलाड़ी और उसके पालतू शेर का खेल देख रही थी। " मनुष्य कैसे इन भयानक पशुओं को इस तरह वश में कर लेता है ? उनके स्नेह पर कैसे इतना निर्भर करता है ?" मैंने कहा , " आपको जो बात एक बहुत गहरी समस्या-सी लग र...