क्या ईश्वर का अस्तित्व है? एक धर्मशास्त्री और एक कवि के बीच हालिया हुई दिशाविहीन बहस पर
क्या ईश्वर का अस्तित्व है? - एक धर्मशास्त्री और एक कवि के बीच हालिया हुई दिशाविहीन बहस पर
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मुफ़्ती शमाइल
द्वारा रखी गयी चतुराईपूर्ण ग़लत पूर्वधारणाओं पर
अपने वक्तव्य
की शुरुआत में ही मुफ़्ती शमाइल कुछ ऐसे मापदण्ड या कसौटियाँ तय करते हैं एवं उनके
अनुसार इन्हें ही किसी भी तर्क की वैधता परखने के लिए एकमात्र वास्तविक पैमाना
माना जाना चाहिए। इसी क्रम में वे इस बहस में तर्कों की विश्वसनीयता जाँचने के लिए
विज्ञान और वैज्ञानिक प्रमाणों को वैध कसौटी मानने से इंकार कर देते हैं। मुफ़्ती
शमाइल के अनुसार, विज्ञान प्राकृतिक और भौतिक संसार का एक अनुभवसिद्ध अध्ययन
है, जबकि ईश्वर
पारलौकिक और आध्यात्मिक जगत से सम्बन्धित है। इसलिए ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध या
ख़ारिज़ करने की क्षमता विज्ञान और अनुभवसिद्ध अवलोकन के दायरे से बाहर है। इसके बाद,
अपने भोले और
अनजान प्रतिद्वन्द्वी को आश्वस्त करने के लिए वे यह स्वीकार करते हैं कि वे अपने
किसी भी तर्क को प्रमाणित करने के लिए न तो दैवीय अवधारणा का और न ही धार्मिक
ग्रन्थों का सहारा लेंगे। अन्ततः वे यह घोषणा करते हैं कि केवल तर्क और विवेक ही
किसी भी तर्क की वैधता परखने के एकमात्र मानदण्ड होंगे।
जावेद अख़्तर ने
शुरुआती कुछ ही मिनटों में पूरी बहस गँवा दी, जब उन्होंने मुफ़्ती को इन
बेतुके और निरर्थक मानकों के साथ आसानी से बच निकलने दिया। सबसे पहले, मुफ़्ती शमाइल
ने अलौकिक और आध्यात्मिक जगत के अस्तित्व को एक निर्विवाद सत्य के रूप में पहले ही
मान लिया और इसी आधार पर विज्ञान और अवलोकन को इस जगत के अध्ययन के लिए अपर्याप्त
घोषित कर दिया, क्योंकि उनके अनुसार विज्ञान केवल प्राकृतिक और भौतिक संसार
का ही अध्ययन कर सकता है। लेकिन क्या इस बहस का मूल उद्देश्य ही यही नहीं था कि इस
कथित अलौकिक और आध्यात्मिक यथार्थ के अस्तित्व को सिद्ध किया जाये? दूसरे शब्दों
में, मुफ़्ती शमाइल
ने उसी चीज़ को पहले से मान लिया, जिसे उन्हें इस बहस के दौरान सिद्ध करना था। उनके तर्क का
आधार (premise) और निष्कर्ष (conclusion) एक ही है—कि एक अलौकिक
सत्ता/यथार्थ मौजूद है। अतः हमारे सम्मानित मुफ़्ती साहब को अपनी ही पूँछ काटते
हुए एक चतुर साँप के रूप में कल्पित करना किसी भी अर्थ में ईशनिन्दा नहीं होगी—जो
वृत्ताकार तर्क (circular logic) और पुनरुक्तिपूर्ण भ्रांति (tautological fallacy) के जाल में
स्वयं ही फँसा हुआ है। इसी पूर्वधारणा का उपयोग वे बाद में बहस में जावेद अख़्तर के
इस तर्क का खण्डन करने के लिए करते हैं कि समय की अवधारणा केवल प्राकृतिक जगत पर
लागू होती है; और चूँकि ईश्वर अलौकिक जगत से सम्बन्धित है, इसलिए समय की
अवधारणा उस पर लागू नहीं होती—और इसीलिए यह पूछना कि ब्रह्माण्ड बनाने से पहले
ईश्वर क्या कर रहा था, एक अप्रासंगिक और अतार्किक प्रश्न है। इसके बाद वे यह भी
विस्तार से कहते हैं कि चूँकि ईश्वर वह “अनिवार्य सत्ता” (Necessary Being)
है, जिसने स्वयं
दिक् और काल की रचना की है, इसलिए वह कभी भी दिक् और काल की सीमाओं में नहीं बँधा हो
सकता। इस लेख में आगे चलकर हम “अनिवार्य सत्ता” के इस खोखले तर्क पर विस्तार से
चर्चा करेंगे। लेकिन यहाँ पाठकों को यह याद रखना चाहिए कि मुफ़्ती शमाइल ने एक बार
भी यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया कि समय के अस्तित्व में आने से पहले ईश्वर
कैसे मौजूद था और उसने दिक् और काल (time and space) की रचना कैसे की। उन्होंने
इसे बस एक सार्वभौमिक और परम सत्य की तरह उछाल दिया—मानो इसके लिए किसी भी प्रकार
के सत्यापन या प्रमाण की आवश्यकता ही न हो।
दूसरी ओर,
मुफ़्ती शमाइल
तर्क और विवेक को विज्ञान तथा भौतिक जगत के विरुद्ध खड़ा कर देते हैं, मानो तर्क और
विवेक, भौतिक यथार्थ
और वैज्ञानिक पद्धति की परिधि से बाहर अवस्थित हों। वैज्ञानिक पद्धति को नकारने की
अपनी जल्दबाज़ी में मुफ़्ती शमाइल “शुद्ध तर्क” और “शुद्ध विवेक” की शरण में चले
जाते हैं—अर्थात् ऐसे पूरी तरह अमूर्त तर्क और विवेक कि, जिसका कोई भौतिक आधार नहीं
है, जो विचारों और
कल्पनाओं के लोक में तमपिशाचों की तरह विचरते हैं और प्राकृतिक संसार की सीमाओं को
लाँघकर पारलौकिक जगत में प्रवेश कर सकते हैं। कोई भी स्कूली छात्र बता सकता है कि
तर्क और विवेक भौतिक यथार्थ से ही अमूर्तीकृत और सामान्यीकृत होते हैं तथा उसी
भौतिक यथार्थ को अधिक वैज्ञानिक और सुस्पष्ट ढंग से समझने के उपकरण के रूप में
कार्य करते हैं। लेकिन जब आप एक ओर भौतिक संसार की सीमाओं से परे किसी चीज़ के
अस्तित्व को पहले ही मान लेते हैं और दूसरी ओर तर्क व विवेक को वैज्ञानिक पद्धति
तथा भौतिक वास्तविकता से अलग कर देते हैं, तब आप तर्क और विवेक का मनमाने ढंग से, अपनी कल्पनाओं
के अनुसार उपयोग कर सकते हैं—ताकि अपने पारलौकिक तर्कों का समर्थन किया जा सके और
किसी पारलौकिक सत्ता के अस्तित्व को “सिद्ध” किया जा सके। ठीक इसी का इस्तेमाल
मुफ़्ती शमाइल शुरुआत से ही करते हैं।
निस्सन्देह,
मुफ़्ती शमाइल
यह भली-भाँति जानते थे कि इस प्रकार की बहस में बिग बैंग और उद्विकास जैसी
अवधारणाएँ अनिवार्य रूप से सामने आएँगी। इसलिए, उन्होंने पहले से ही एक तरह
का पूर्वाक्रमण (प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक) करते हुए विज्ञान को ही पूरी तरह ख़ारिज
कर दिया और तर्क व विवेक को वैज्ञानिक पद्धति से अलग कर दिया, ताकि इन
अवधारणाओं के प्रयोग को प्रारम्भ में ही निष्प्रभावी किया जा सके।
लेकिन यह तथ्य
कि जावेद अख़्तर ने मुफ़्ती शमाइल को इतनी गम्भीर और आत्मघाती पूर्वधारणाओं के साथ
सहजता से निकल जाने दिया—जो किसी भी तार्किक बहस की बुनियाद को ही ढहा देती
हैं—दरअसल स्वयं उनके वैज्ञानिक पद्धति की कमज़ोर समझदारी को ही उजागर करता है।
वास्तव में, जावेद अख़्तर
इतने ईमानदार थे कि उन्होंने स्वीकार कर लिया कि वे विज्ञान के सहारे बहस नहीं
करेंगे—क्योंकि उसमें वे स्वयं को कमज़ोर मानते हैं—बल्कि सामान्य बोध (कॉमन सेंस)
के आधार पर बहस करेंगे। काश, सामान्य बोध (कॉमन सेंस) स्वयं तर्क कर सकता! तब हमें उस
बहस के दौरान विवेक और तर्क की जो यातनापूर्ण दुर्दशा देखने को मिली, उसका साक्षी
नहीं बनना पड़ता।
सबसे पहले ही
यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि लल्लनटॉप पर ईश्वर के अस्तित्व को लेकर जो बहस
हमने देखी, वह अपने मूल
में भौतिकवाद और भाववाद के बीच चली आ रही पुरानी बहस की एक साधारण-सी पुनरावृत्ति
से अधिक कुछ नहीं है। दोनों पक्षों की सारी दलीलें—या कहें कुतर्क—अपने सार में
पदार्थ और विचार, अस्तित्व और चेतना के बीच प्राथमिकता के मूल प्रश्न पर आकर
सिमट जाती हैं। भौतिकवादी विश्वदृष्टिकोण, अपनी विभिन्न धाराओं के बावजूद, यह मानता है कि
पदार्थ प्राथमिक है और विचार पदार्थ से उत्पन्न होते हैं तथा पदार्थ को बदल भी
सकते हैं। इसके विपरीत, भाववादी विश्वदृष्टिकोण, अपनी अनेक उपधाराओं के
बावजूद, यह मानता है कि
विचार ही प्राथमिक है और पदार्थ मात्र विचारों की अभिव्यक्ति है। यही इस पूरी बहस
का मूल तत्व है, जिसे जावेद अख़्तर समझने में स्पष्टतः असफल रहे।
सृजनवाद
(क्रियेशनिज़्म), आकस्मिकता का सिद्धान्त, कारणों की अनन्त प्रतिगमन
और “अनिवार्य सत्ता” पर
मुफ़्ती शमाइल
का मूल तर्क यह है कि हर वस्तु—चाहे वह प्लास्टिक की गेंद हो, फूल हो या
कार—किसी न किसी द्वारा बनायी गयी है। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए वे इस निष्कर्ष
पर पहुँचते हैं कि ब्रह्माण्ड भी किसी ने बनाया होगा। यह हर धर्म के पुरोहितों
द्वारा प्रतिपादित सृजनवादी सिद्धान्त का एक पारम्परिक रूप है। हर वस्तु और हर
घटना का अस्तित्व किसी कारण या किसी कारण-सूत्र द्वारा निर्धारित होता है। दूसरे
शब्दों में, हर चीज़
आकस्मिक या किसी अन्य चीज़ पर निर्भर होती है, जिसके बिना उसका अस्तित्व
सम्भव नहीं। इसके बाद मुफ़्ती शमाइल कहते हैं कि हम इन आकस्मिकताओं में अनन्त रूप
से पीछे नहीं जा सकते; अर्थात् हम एक कारण से उसके कारण और फिर उसके कारण की ओर
अनन्त तक नहीं बढ़ सकते, क्योंकि ऐसा होने पर हमारा अस्तित्व ही सम्भव नहीं होगा।
कारण-कार्य की इस लम्बी श्रृंखला में हमें किसी एक बिन्दु पर रुकना होगा, और वही सबका
परम कारण होगा—या मुफ़्ती शमाइल के शब्दों में, “अनिवार्य सत्ता” (Necessary
Being)। यह “अनिवार्य
सत्ता” ही एकमात्र स्वतंत्र सत्ता है, जो किसी अन्य पर निर्भर नहीं है। वही सभी
सृष्टियों की सृष्टिकर्ता है, स्वयं दिक्-काल का भी रचयिता—और इसीलिए एकमात्र शाश्वत
सत्ता है। “अनिवार्य सत्ता” या अन्तिम सृष्टिकर्ता की यह खोज वस्तुतः भौतिक जगत की
सीमा निर्धारित करने और प्रथम कारण को किसी विचार में खोजने का ही एक तरीका है।
केवल भाववादी ही नहीं, बल्कि यांत्रिक भौतिकवादी भी अक्सर प्रथम-कारण की इस
अवधारणा को स्वीकार करते रहे हैं, जिसका उदाहरण न्यूटन की “प्रथम प्रेरणा” (first
impulse) की संकल्पना
है। यदि हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो पाते हैं कि सुसंगत भौतिकवादी और द्वन्द्वात्मक
भौतिकवादी दृष्टिकोण से अनेक वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने इस प्रथम-कारण के दावे
का खण्डन किया है। डेमोक्रिटियस और एपिक्यूरस से लेकर दिदरो और मार्क्स तक;
ओपारिन,
लेवोण्टिन और
बर्नाल से लेकर सकाता, युकावा और ताकेतानी तक—सभी ने यह माना है कि गतिमान पदार्थ
ही एकमात्र परम श्रेणी है, और पदार्थ के उत्पन्न होने तथा नष्ट होने की प्रक्रिया ही
एकमात्र शाश्वत परिघटना है।
मुफ़्ती शमाइल
यह मानकर चलते हैं कि वास्तविक, भौतिक संसार में कारणों का अनन्त प्रतिगमन सम्भव ही नहीं है,
और वे यह बताये
बिना ही इसे एक स्वयंसिद्ध सत्य की तरह घोषित कर देते हैं कि ऐसा क्यों असम्भव है।
वे यह भी स्पष्ट नहीं करते कि शाश्वत गति में पदार्थ का अस्तित्व दार्शनिक रूप से
असम्भव क्यों माना जाये। न ही जावेद अख़्तर के पास इतना दार्शनिक और वैज्ञानिक
विशेषज्ञता थी कि वे मुफ़्ती शमाइल को इस मूलभूत प्रश्न पर खींच सकें। आज बिग बैंग
इतना व्यापक रूप से स्वीकृत वैज्ञानिक सिद्धान्त बन चुका है कि बहुत कम
धर्मशास्त्री इसकी प्रामाणिकता को सीधे खारिज कर पाते हैं। इसलिए, बिग बैंग को
खुलकर नकारने के बजाय, वे अब इस तथ्य का लाभ उठाते हैं कि बिग बैंग से पहले क्या
था, यह अभी अज्ञात
है, और इसी आधार पर
यह दावा करते हैं कि ईश्वर या “अनिवार्य सत्ता” ने ही बिग बैंग के माध्यम से
ब्रह्माण्ड की रचना की।
इसके विपरीत,
सुसंगत और
द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी यह मानते हैं कि भले ही बिग बैंग के बाद स्वयं दिक्-काल
की निर्माति हुई हो, परन्तु इससे पहले जो कुछ भी अस्तित्व में था, वह भौतिक जगत
के बाहर नहीं था। यदि बिग बैंग से पहले केवल कोई ‘फील्ड’ ही मौजूद था, तब भी वह भौतिक
जगत का ही हिस्सा होगा—जब हम पदार्थ को एक दार्शनिक श्रेणी के रूप में परिभाषित
करते हैं, न कि अनिवार्य
रूप से केवल एक भौतिक (फिज़िकल) श्रेणी के रूप में। वास्तव में, कैसिमिर
प्रभाव—अर्थात क्वाण्टम निर्वात में होने वाले उतार-चढ़ाव—और डार्क एनर्जी तथा
डार्क मैटर की उपस्थिति, बिग बैंग मॉडल की अपूर्णता की ओर संकेत करती हैं और इस
प्रश्न की ओर भी कि “बिग बैंग से पहले” क्या अस्तित्व में था। विज्ञान को यह कहने
में कोई संकोच नहीं है कि इन घटनाओं के बावजूद, जो बिग बैंग से पहले किसी
भौतिक अस्तित्व की ओर संकेत करती हैं, हम अभी निश्चित रूप से नहीं जानते कि बिग बैंग
से पहले क्या था। लेकिन द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी ज्ञान-सिद्धान्त यह प्रतिपादित
करता है कि भले ही यह आज अज्ञात हो, भविष्य में इसे निश्चित रूप से जाना जा सकता है।
ज्ञात और
अज्ञात का अन्तर्विरोध
ज्ञान के विकास
के क्षेत्र में ज्ञात और अज्ञात के बीच का अन्तर्विरोध निरन्तर मौजूद रहता है,
और यह
अन्तर्विरोध स्वयं गतिशील होता है। जो आज अज्ञात है, वह कल ज्ञात हो जाता है;
लेकिन तब तक
अज्ञात का एक नया क्षितिज सामने आ चुका होता है। ज्ञात का निरन्तर टूटकर अज्ञात और
ज्ञात में बदलना, और साथ ही अज्ञात का भी लगातार ज्ञात और अज्ञात में विभाजित
होते जाना—इन दोनों के बीच बना रहने वाला अविच्छिन्न अन्तर्विरोध ही ज्ञान की गति
है; यही विज्ञान की
गति है। ज्ञात और अज्ञात के इस अन्तर्विरोध के माध्यम से न केवल वर्तमान के बारे
में हमारा ज्ञान—विस्तारात्मक रूप से भी और गहन रूप से भी—बढ़ता है, बल्कि अतीत के
बारे में हमारी समझ और ब्रह्माण्ड के विकास की प्रक्रिया की समझ भी निरन्तर गहरी
होती जाती है।
भाववादी अज्ञात
को “अनिवार्य सत्ता”, किसी परम विचार या ईश्वर से प्रतिस्थापित कर देते हैं—जैसा
कि इस बहस में मुफ़्ती शमाइल करते हैं। उनके लिए, केवल इसलिए कि आज हम यह
निश्चित रूप से नहीं जानते कि बिग बैंग से पहले क्या था, कारणों की अनन्त प्रतिगमन
की प्रक्रिया वहीं ढह जाती है, और उसी शून्य को भरने के लिए वे “अनिवार्य सत्ता” की
अवधारणा चुपके से ले आते हैं। अज्ञेयवादी अज्ञात को रहस्यमय बना देते हैं और यह
दावा करते हैं कि अज्ञात को कभी भी पूरी तरह जाना नहीं जा सकता। भाववादियों और
अज्ञेयवादियों के विपरीत, सुसंगत और द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी यह मानते हैं कि हर
अज्ञात को जाना जा सकता है, लेकिन उसका ज्ञान स्वयं एक नये अज्ञात को जन्म देगा। पदार्थ
निरन्तर गति में है। इसका अर्थ है कि हमारा भौतिक संसार लगातार बदल रहा है,
और जब तक हम
किसी प्रक्रिया के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं, तब तक वह प्रक्रिया स्वयं
बदल चुकी होती है। दूसरे शब्दों में, भौतिक जगत के बारे में हमारी संज्ञानात्मक समझ,
स्वयं भौतिक
जगत में होने वाले परिवर्तनों से पीछे रह जाती है। इसी कारण सुसंगत और
द्वन्द्वात्मक भौतिकवादियों के लिए कोई शाश्वत, अपरिवर्तनीय परम सत्य नहीं
होता। किसी भी क्षण का परम सत्य उस क्षण में मौजूद अनन्त सापेक्ष सत्यों का कुल
योग होता है। लेकिन ठीक अगले ही क्षण, भौतिक जगत में हुए परिवर्तन के कारण, अनन्त सापेक्ष
सत्यों का यह कुल योग बदल जाता है और उसके साथ परम सत्य भी बदल जाता है। इसलिए
विज्ञान कभी यह दावा नहीं करता कि किसी एक समय पर उसके पास सभी उत्तर मौजूद हैं।
विज्ञान का एकमात्र दावा यह है कि हर चीज़ जानी जा सकती है। इसके विपरीत, धर्म यह दावा
करता है कि उसके पास पहले से ही सभी उत्तर हैं—क्योंकि वह कभी सही प्रश्न ही नहीं
पूछता।
द्वन्द्वात्मक
भौतिकवादी यह भी मानते हैं कि जब तक हमारे सामाजिक जीवन में अज्ञात का पक्ष प्रमुख
बना रहेगा, तब तक किसी न
किसी रूप में पारलौकिक और अलौकिक वास्तविकताओं का सहारा लिया जाता रहेगा। दूसरे
शब्दों में, जब तक सामाजिक
असुरक्षा बनी रहेगी, तब तक किसी न किसी रूप में धर्म भी अस्तित्व में बना रहेगा।
आदिम और दास समाजों में लोग प्रकृति-देवताओं की पूजा करते थे, क्योंकि उनका
पूरा अस्तित्व प्रकृति की अन्धी शक्तियों की दया पर निर्भर था। इसी तरह पूँजीवादी
समाज में, भले ही हमने
प्रकृति के गति-नियमों की कहीं बेहतर समझ विकसित कर ली हो और आदिम समाजों की तुलना
में प्रकृति की अन्धी शक्तियों को काफी हद तक नियंत्रित करने में सफल भी हुए हों,
फिर भी
शोषणकारी पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की गयी अनिश्चितता बनी रहती है। लोगों की
यही असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य उन्हें किसी ऐसी अलौकिक सत्ता की शरण में धकेल
देता है, जो इन
अनिश्चितताओं से निपटने में उनकी सहायता कर सके। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी,
जब तक लोग समाज
के गति के नियमों के प्रति सचेत नहीं हो जाते और इस चेतना के आधार पर समाज और अपने
जीवन को बदलने में सक्षम नहीं हो जाते।
ज्ञात और
अज्ञात के बीच का अन्तर्विरोध वर्गीय समाजों में केवल भौतिकवाद और भाववाद के बीच
संघर्ष के रूप में ही नहीं, बल्कि धर्म और विज्ञान के बीच संघर्ष के रूप में भी प्रकट
हुआ है। चाहे यह बात कितनी ही कड़वी क्यों न लगे, लेकिन तथ्य यही है कि धर्म
ने अक्सर उन लोगों का उत्पीड़न और दमन किया है जो विज्ञान के पक्ष में खड़े थे,
क्योंकि
विज्ञान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रचलित दमनकारी सामाजिक सम्बन्धों को तथा
ईश्वर और उस शासक वर्ग की सत्ता को चुनौती देता रहा है, जो अपनी वैधता ईश्वर से
ग्रहण करता था। इसलिए जब मुफ़्ती शमाइल बहस में यह कहते हैं कि धर्म विज्ञान में
बाधा नहीं डालता, तो यह एक सरासर झूठा दावा है। इब्न सीना से लेकर इब्न रुश्द
तक और गैलीलियो से लेकर ब्रूनो तक—अनेकों वैज्ञानिक और विचारक इस सच्चाई के जीवित
प्रमाण हैं। भारत में क्या चार्वाक, कणाद और आर्यभट्ट के लेखन को योजनाबद्ध ढंग से
दबाया और हाशिये पर नहीं डाला गया, ताकि उनके क्रान्तिकारी विचार आम जनता तक न पहुँच सकें?
मुफ़्ती शमाइल
विज्ञान और “विज्ञानवाद” के बीच एक बनावटी भेद भी करते हैं और कहते हैं कि धर्म
विज्ञान में नहीं, बल्कि “विज्ञानवाद” में बाधा डालता है—अर्थात इस विचार में
कि ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र वैध तरीक़ा वैज्ञानिक पद्धति है। अब यह निर्णय
हम विद्वान पाठकों पर छोड़ते हैं कि यदि वैज्ञानिक पद्धति में बाधा डालना विज्ञान
में बाधा डालने के बराबर नहीं है, तो फिर उसे और क्या कहा जाये?
आकस्मिकता और
अनिवार्यता का द्वन्द्व
इतिहास
आकस्मिकता और अनिवार्यता के द्वन्द्व के माध्यम से आगे बढ़ता है। अनिवार्यता से
आशय उन व्यापक वस्तुगत परिस्थितियों और गति के नियमों से है, जो इन
परिस्थितियों की सीमाएँ निर्धारित करते हैं। आकस्मिकता से आशय उस विशिष्ट और ठोस
रूप से है, जिसके माध्यम
से अनिवार्यता स्वयं को अभिव्यक्त करती है। अनिवार्यता केवल अनेक संयोगों के
माध्यम से ही अस्तित्व में रहती है, और आकस्मिकता स्वयं अनिवार्यता द्वारा ही
निर्धारित, सीमित और
संरचित होता है। दूसरे शब्दों में, ठोस नियमों द्वारा परिभाषित वस्तुगत परिस्थितियों के एक
व्यापक ढाँचे के भीतर, पदार्थ की विभिन्न रूपों में अनेक व्यवस्थाएँ सम्भव होती
हैं। ये विभिन्न रूप ऊपर से मनमाने और आकस्मिक प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन अन्तिम
विश्लेषण में वे उसी व्यापक ढाँचे के वस्तुगत नियमों द्वारा संचालित होते हैं।
स्वतंत्रता का अर्थ है अनिवार्यता को उसके सार में समझना—अर्थात् उन गति के नियमों
को समझना जो हमारे सामाजिक और प्राकृतिक संसार को संचालित करते हैं—और इसी समझ के
आधार पर समाज और प्रकृति को सचेत रूप से बदलना। लेकिन जब तक हम संयोग और
अनिवार्यता के बीच के इस अन्तर्विरोध को नहीं समझते, तब तक या तो हम नियतिवाद के
जाल में फँस जाते हैं—जैसा कि मुफ़्ती शमाइल के मामले में दिखता है, जहाँ वे हर
चीज़ को पूर्वनिर्धारित मानते हैं—या फिर अनियतिवाद और मनोगतवाद के शिकार हो जाते
हैं—जैसा कि जावेद अख़्तर के मामले में, जहाँ वे यह कह देते हैं कि प्रजनन की प्रक्रिया
भी पूरी तरह यादृच्छिक है और कोई शुक्राणु संयोगवश किसी अण्डाणु से जुड़ जाता है।
जावेद अख़्तर यह नहीं समझते कि शुक्राणुओं और अण्डाणुओं का बनना, किसी शुक्राणु
का अण्डाणु से जुड़ना और युग्मनज (ज़ायगोट) का विकास—यह सब तभी सम्भव होता है जब
पहले से कुछ पूर्वशर्तें पूरी हों, और यह पूरी प्रक्रिया मानव जीवविज्ञान के कुछ ठोस नियमों के
माध्यम से ही घटित होती है। यदि ऐसा न होता, तो अण्डाणु और शुक्राणु में
मौजूद कुछ विशिष्ट गुणसूत्रों (क्रोमोसोम) के संयोजन से सन्तान का एक निश्चित लिंग
कैसे निर्धारित होता है, इसे कभी समझाया ही नहीं जा सकता था, और सन्तान का लिंग पूरी तरह
एक आकस्मिक घटना मात्र होता।
दूसरी ओर,
मुफ़्ती शमाइल
ब्रह्माण्ड की “पूर्णता” पर मुग्ध दिखाई देते हैं और यह घोषणा करते हैं कि इतनी
जटिल व्यवस्था इतनी सुचारु रूप से काम नहीं कर सकती, यदि इसे “अनिवार्य सत्ता”
द्वारा रचा और संचालित न किया गया हो। जब कुछ आवश्यक पूर्वशर्तें पूरी हुईं,
तो हाइड्रोजन
और हीलियम गैसें ठण्डे होकर निहारिकाओं (नेब्युला) के रूप में संघनित हुए, जिनसे आगे चलकर
तारे और आकाशगंगाएँ बनीं। अब कौन-से तारे पहले बनेंगे, यह व्यापक ब्रह्माण्डीय
नियमों के अन्तर्गत कार्य करने वाली आकस्मिकता का प्रश्न है। ब्रह्माण्ड के विकास
के एक निश्चित चरण पर सरल अणुओं से जटिल अकार्बनिक यौगिक उत्पन्न हुए। अब कौन-से
जटिल अकार्बनिक यौगिक पहले बनेंगे और उनके विशिष्ट गुण क्या होंगे—यह अकार्बनिक
रसायन के नियमों के भीतर घटित होने वाला संयोग का ही परिणाम है। आगे कुछ अन्य
परिस्थितियों में, ये जटिल अकार्बनिक यौगिक एक विशेष ढंग से व्यवस्थित होकर
कार्बनिक यौगिकों में रुपान्तरित हुए। यह व्यवस्था किन-किन विशेष प्रक्रियाओं से
बनी—यह भी कार्बनिक रसायन के व्यापक नियमों के अन्तर्गत प्रकट होने वाली आकस्मिकता
ही है। हाइड्रोथर्मल वेण्ट्स में, जहाँ जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ—जैसे गर्म पानी की
उपलब्धता, अनुकूल
ऊर्जा-प्रवणता और कार्बनिक अणुओं की पर्याप्त सघनता—उपलब्ध थीं, वहाँ पहले
एककोशिकीय जीव उत्पन्न हुए। अब इन एककोशिकीय जीवों में कौन-से विशेष गुण होंगे,
यह जैव-रसायन
के व्यापक नियमों के अन्तर्गत कार्य करने वाली आकस्मिकता का परिणाम था। इसी प्रकार,
अफ्रीका के
उष्णकटिबन्धीय वर्षावनों में वानरों की विभिन्न प्रजातियों में से केवल एक विशेष
प्रजाति का अलग होकर सवाना क्षेत्रों में आना और मानवों के पूर्वज बनना—यह भी
व्यापक वस्तुगत अनिवार्य परिस्थितियों की सीमाओं के भीतर घटित हुई आकस्मिकता ही
था। मुफ़्ती शमाइल आकस्मिकता या स्व-स्फूर्तता की भूमिका को
पूरी तरह नकार देते हैं। आकस्मिकता-सिद्धान्त (कॉन्टिंजेंसी थ्योरी) और कारणों की
अनन्त प्रतिगमन की असम्भव्यता को सिद्ध करने के लिए, श्रोताओं में से एक अन्य
मौलवी ने टिप्पणी की कि जावेद अख़्तर का कवि होना इस बात का प्रमाण है कि उन्हें
किसी अन्य कवि ने कविता सिखायी होगी; और उस कवि का भी कोई शिक्षक रहा होगा—और यह
सिलसिला पीछे की ओर चलते-चलते अन्ततः ऐसे पहले कवि तक पहुँचेगा, जिसे किसी ने
नहीं सिखाया, अर्थात् जिसे
“अनिवार्य सत्ता” या ईश्वर ने ही रचा होगा। उस मौलवी के अनुसार, यदि ऐसा न होता,
तो जावेद
अख़्तर कवि ही नहीं बन सकते थे। यहाँ मुफ़्ती शमाइल और उनके सहयोगी जिस मूल बिन्दु
को नज़रअन्दाज़ कर जाते हैं, वह यह है कि कविता इतिहास के एक विशेष मोड़ पर उत्पन्न हुई।
पहली कविता शब्दों की एक ऐसी विशिष्ट और गुणात्मक रूप से नयी व्यवस्था रही होगी,
जो उससे पहले
अस्तित्व में ही नहीं थी। शब्दों की यह नई संरचना स्वयं एक आकस्मिकता का परिणाम
थी—हालाँकि यह आकस्मिकता समाज और भाषा के गति के नियमों द्वारा निर्धारित सीमाओं
के भीतर ही घटित हुई थी। यही तर्क समाज और प्रकृति में हर नई परिघटना के उद्भव पर
समान रूप से लागू होता है। निस्सन्देह, कोई भी द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी स्वस्फूर्तता को
वस्तुीकृत या सारतत्व में परिवर्तित नहीं कर सकता। लेकिन स्व-स्फूर्तता और
आकस्मिकता की भूमिका को पूरी तरह नकार देना भी एक प्रकार की पद्धतिगत संकीर्णता
(मेथडोलॉजिकल मायोपिया) ही होगी।
यहाँ आइन्स्टीन
का प्रसिद्ध कथन “ईश्वर पासे नहीं खेलता” भी हमारे कानों में गूँजता है।
निस्सन्देह, आइन्स्टीन
आस्तिक नहीं थे, लेकिन उनका आशय यह था कि प्रकृति में सब कुछ पूर्वनिर्धारित
है। यह नियतिवाद, अनिश्चितता सिद्धान्त को लेकर हुई बहस में कोपेनहेगन स्कूल
के मनोगतवाद और अज्ञेयवाद के प्रति आइन्स्टीन की प्रतिक्रिया थी।
हम इस बहस के
विवरण में नहीं जाएँगे, लेकिन इतना अवश्य पुनः रेखांकित करेंगे कि यदि आकस्मिकता और
अनिवार्यता के इस द्वन्द्व को ठीक से नहीं समझा गया, तो केवल मुफ़्ती शमाइल और
जावेद अख़्तर ही नहीं, बल्कि आइन्स्टीन, बोर और हाइज़ेनबर्ग जैसे महान वैज्ञानिक भी
नियतिवाद, मनोगतवाद और
अज्ञेयवाद के गड्ढे में गिर सकते हैं और वस्तुगत या व्यक्तिपरक भाववाद के लिए
रास्ता खोल सकते हैं।
नैतिकता की
अनैतिहासिकता, ईश्वर और ग़ज़ा पर
बहस का एक बड़ा
हिस्सा इस प्रश्न पर ख़र्च किया गया या कहें कि व्यर्थ किया गया कि - बुराई क्यों
अस्तित्व में है और कौन तय करता है कि क्या नैतिक है और क्या अनैतिक। इस प्रश्न पर
दोनों पक्षों की मुख्य समस्या यह थी कि ‘अच्छा’, ‘बुरा’, ‘नैतिक’ और
‘अनैतिक’ जैसी श्रेणियों को कुछ पूर्ण, शाश्वत और मानवीय स्वभाव में अन्तर्निहित अमूर्त
श्रेणियों की तरह लिया गया। इन श्रेणियों को उनके ऐतिहासिक सन्दर्भ से पूरी तरह
काट दिया गया, और यह मूल तथ्य पूरी तरह नज़रअन्दाज़ कर दिया गया कि ये
श्रेणियाँ मानव समाज के इतिहास में कुछ विशिष्ट चरणों पर उत्पन्न हुईं और सामाजिक
संरचनाओं तथा सामाजिक सम्बन्धों के बदलने के साथ निरन्तर बदलती भी रही हैं। उदाहरण
के लिए, आदिम
शिकारी–संग्रहकर्ता समाजों में, केवल न्यूनतम जीवन-निर्वाह से अधिक संचय करना और उसे अपने
पास रखना अनैतिक माना जाता था और सामाजिक रूप से हतोत्साहित किया जाता था। लेकिन
पूँजीवादी समाज में, उत्पादन प्रक्रिया में भाग लिए बिना भी अधिक से अधिक हड़पने
की क्षमता को उत्सव की तरह मनाया जाता है। इसी तरह, आदिम समाजों में किसी बच्चे
की वंश-परम्परा को उसकी माता के माध्यम से निर्धारित करना एक ‘अच्छी’ और ‘वांछनीय’
बात मानी जाती थी। लेकिन वर्गीय समाजों में इसे ‘बुरा’ और ‘अवांछनीय’ समझा जाने
लगा। सामन्ती समाज में, ईश्वर-प्रदत्त राजा और सामान्य जनता के बीच समानता का विचार
‘अनैतिक’ माना जाता था, जबकि पूँजीवादी समाज में शासक और शासित के बीच औपचारिक और
क़ानूनी समानता स्थापित हुई और इसे प्रगतिशील बुर्जुआ वर्ग द्वारा एक ‘अच्छी’ और
सकारात्मक बात माना गया।
इसी प्रकार,
ईश्वर का भी
अपना एक इतिहास है। अतीत में ऐसा समय था जब न तो धर्म था और न ही ईश्वर। जॉर्ज
थॉमसन के अनुसार, आदिम समाजों में जादू और टोटेमवाद के भीतर ही धर्म, विज्ञान और कला
एक अविभाजित रूप में समाहित थे। इसके बाद बहुईश्वरवादी पैगन धर्मों का उदय
हुआ—भूमध्यसागर के आसपास के क्षेत्र में हेलेनिक पैगन धर्म और यूरोप के आन्तरिक
भागों में जर्मेनिक पैगन धर्म। ये पैगन धर्म बहुईश्वरवादी थे और प्राकृतिक
शक्तियों की पूजा करते थे। यूरोप और भूमध्यसागर के तटीय क्षेत्रों में दास समाज के
विघटन और सामन्तवाद के उदय के दौर में पैगन धर्मों की जगह ईसाई धर्म ने ले ली।
भारत में, जिसे मोटे तौर
पर हिन्दू धर्म कहा जाता है, उसका भ्रूण रूप आरम्भिक वैदिक काल में उभरा, जब भारतीय
उपमहाद्वीप शिकारी–संग्रहकर्ता समाज से स्थायी कृषि-आधारित समाज की ओर संक्रमण कर
रहा था। उत्तर वैदिक काल में यह कुछ हद तक सुदृढ़ हुआ और बाद के विभिन्न सामाजिक
ढाँचों में इसमें गुणात्मक परिवर्तन आते रहे। हालाँकि जावेद अख़्तर ने धर्म की
बदलती प्रकृति के विचार की ओर संकेत तो किया, लेकिन अपने यांत्रिक
भौतिकवादी दृष्टिकोण के कारण वे इस मूलभूत बात को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं कर
पाये कि स्वयं ईश्वर भी एक ऐतिहासिक उत्पाद है और उसका अस्तित्व इतिहास के साथ
बदलता रहा है।
किसी विशेष
समाज के नैतिक मूल्य और सद्गुण उस समाज के सामाजिक सम्बन्धों पर निर्भर करते
हैं—अर्थात् इस पर कि उत्पादन, वितरण, श्रम का सामाजिक विभाजन और राज्यसत्ता किस प्रकार संगठित
हैं। आज की दुनिया की बुराइयाँ पूँजीवादी और साम्राज्यवादी संरचनाओं की ही उपज
हैं। जिस समाज में उत्पादन सामाजिक होता है लेकिन अधिग्रहण निजी, जहाँ उत्पादन
का उद्देश्य लोगों के लिए एक मानवीय और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना नहीं बल्कि
केवल अधिकतम मुनाफ़ा कमाना होता है—वहाँ शोषण, सामाजिक उत्पीड़न, ग़रीबी,
कुपोषण,
भूख और युद्ध
स्थाई विशेषताएँ बने रहते हैं। इसलिए ग़ज़ा में हर दिन दर्जनों बच्चों की मौत को
ईश्वर की “परीक्षा” बताना और यह कहना कि बाद में उन्हें उसका प्रतिफल मिलेगा—जैसा
कि मुफ़्ती शमाइल मानते हैं—न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि घृणित और अमानवीय भी
है। यह कथन इतना विकृत और अमानवीय है कि कोई भी संवेदनशील इंसान इसे स्वीकार नहीं
कर सकता। ग़ज़ा में मारे गये हज़ारों बच्चों को केवल इस बात की जाँच का माध्यम मान
लेना कि कौन अच्छा है और कौन बुरा, या यह कहना कि सर्वज्ञ ईश्वर इन बच्चों को ऐसे टीके दे रहा
है जिनका लाभ हम समझ नहीं सकते लेकिन जिन पर हमें आस्था रखनी चाहिए—ये केवल
धर्मशास्त्रीय दावे नहीं हैं, बल्कि अश्लील और विकृत वक्तव्य हैं, जिनका किसी भी तरह की सभ्य
बहस में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। लेकिन विडम्बना यह है कि ग़ज़ा में बच्चों की
मौत के सवाल पर जावेद अख़्तर भी पूरी तरह निःशब्द दिखाई दिये। यह तथ्य कि
फ़िलिस्तीन में ज़ायनवादी सेटलर–औपनिवेशिक परियोजना अमेरिका और अन्य उन्नत पूँजीवादी
देशों के साम्राज्यवादी हितों की सेवा के लिए रची गयी एक साज़िश है—जिसे समझना
जावेद अख़्तर की उदार बुर्जुआ चेतना की समझ से परे है। परिणामस्वरूप, वे केवल इतना
ही बुदबुदा पाये कि “ज़्यादातर लोग शान्ति से रहना चाहते हैं और कुछ लोग ग़लत
रास्ता अपना रहे हैं।” लेकिन इस प्रश्न का जावेद अख़्तर के पास कोई जवाब नहीं है
कि आख़िर इज़रायल क्यों ग़लत रास्ता अपना रहा है?
जावेद अख़्तर
की सीमाओं पर
जावेद अख़्तर
एक लिबरल बुद्धिजीवी हैं, जिनका विश्वदृष्टिकोण निगमनवादी, अनुभववादी, प्रत्ययवादी और
यांत्रिक भौतिकवादी है। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, उनके पास न तो दर्शन का ठोस
वैचारिक आधार है और न ही वैज्ञानिक पद्धति की गहरी समझदारी है। इसी कारण वे इस
“अन्तिम युद्ध” को केवल “सहज बोध” के सहारे लड़ने की कोशिश करते हैं। बहस के दौरान
यह बात बार-बार उजागर होती है। उदाहरण के लिए, जब वे पूरी बहस का शायद
सबसे बेतुका कथन देते हैं कि “बहुमत तय करता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा”,
तो यह उनके
अनुभववादी दृष्टिकोण को नंगा कर देता है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य था कि जो
व्यक्ति स्वयं को भौतिकवाद का प्रतिनिधि बताता है, वह इस प्रश्न पर एक भाववादी
द्वारा इतनी आसानी से घेर लिया गया। किसी विशेष क्षण पर बहुमत निश्चित रूप से किसी
ग़लत बात या किसी ग़लत व्यक्ति का समर्थन कर सकता है। क्या सही है और क्या ग़लत—यह
इस बात से तय नहीं होता कि किसी समय लोग क्या सोचते हैं, बल्कि इससे तय होता है कि
आम मेहनतकश जनता के हित में क्या है। विज्ञान, इतिहास और हमारा समग्र
विश्वदृष्टिकोण ही वे विश्लेषणात्मक चश्मे हैं, जिनके माध्यम से हम यह तय
करते हैं कि लोगों के हित में क्या है और क्या नहीं। अब उस दूसरे सबसे हास्यास्पद
तर्क की ओर आते हैं, जिसे उन्होंने अपनी घनी मूर्खताओं की तरकश से निकालकर
दर्शक-दीर्घा में बैठे अपने लिबरल समर्थकों पर चला दिया—धर्म और शराब के बीच की
तुलना। उनका दावा था कि शराब यदि सीमित मात्रा में पी जाये—यानी रोज़ दो पैग—तो वह
सेहत के लिए अच्छी हो सकती है; समस्या यह है कि ज़्यादातर लोग दो पैग पर नहीं रुकते और
ज़्यादा पीने लगते हैं, जिससे सारी गड़बड़ियाँ पैदा होती हैं। इसी तरह, जावेद अख़्तर
के अनुसार धर्म भी यदि “संयम” में लिया जाये तो ठीक है; समस्या तब पैदा होती है जब
लोग धर्म में पूरी तरह “नशे” में डूब जाते हैं और समाज की सारी बुराइयाँ खड़ी कर
देते हैं। सबसे पहले तो ऐसा लगता है कि हमारे सम्मानित जावेद अख़्तर स्वयं
उदारतावाद के इस मीठे अमृत की अपनी दैनिक ख़ुराक पर क़ाबू नहीं रख पाये। यह वही क्लासिक
उदारतावादी तर्क है कि हर चीज़ अगर संयमता में घटित हो तो ठीक है और अति में हो
जाये तो समस्या बन जाती है। एक उदारतावादी शोषण को संयमता में चाहता है, ग़रीबी को
संयमता में, बच्चों की
हत्या को संयमता में, युद्ध को संयमता में, न्याय को संयमता में—और इसी
तरह आगे अन्य चीज़ें को भी संयमता से होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, पूरी बहस के
दौरान जावेद अख़्तर द्वारा यूरोप का एक प्रकार से महिमामण्डन भी देखने को मिला,
जिसने फिर से
उनकी बुर्जुआ उदारतावादी कल्पना को उजागर कर दिया। जावेद अख़्तर द्वारा बहस में
उद्धरित गयी ऐसी अनेक अन्य उदारतावादी और यांत्रिक भौतिकवादी मूर्खताएँ भी हैं,
जिनका यहाँ
विस्तार से वर्णन करना सम्भव नहीं है।
इतना कहना ही
पर्याप्त होगा कि भौतिकवाद और भाववाद के बीच हज़ारों वर्षों से चली आ रही बहस और
संघर्ष के लम्बे इतिहास में शायद ही कभी भौतिकवाद को उतनी शर्मनाक स्थिति का सामना
करना पड़ा हो, जितना लल्लनटॉप पर हुई इस बहस में हुआ। मुफ़्ती शमाइल के वे
सभी अनुयायी, जो इस बहस के
परिणाम को आस्था और आस्तिकता की विज्ञान और नास्तिकता पर निर्णायक जीत के रूप में
मना रहे हैं, उन्हें यह याद
रखना चाहिए कि यह असमानों के बीच हुई बहस थी। यह एक ओर धर्मशास्त्र में भली-भाँति
प्रशिक्षित, सुसंगत वस्तुगत
भाववादी और दूसरी ओर एक लिबरल कवि—सह—सहज बोध पर निर्भर यांत्रिक भौतिकवादी के बीच
की मुठभेड़ थी, जो अठारहवीं सदी के दिदरो और वोल्तेयर जैसे रैडिकल बुर्जुआ
भौतिकवादियों के स्तर तक भी नहीं पहुँच पाया था—उन्नीसवीं सदी के द्वन्द्वात्मक
भौतिकवाद की तो बात ही छोड़ ही दीजिए। इतिहास साक्षी है कि ऐसी टक्करों में सुसंगत
भाववाद अक्सर यांत्रिक भौतिकवाद पर विजय प्राप्त करता है। इसलिए इसे भाववाद की
भौतिकवाद पर जीत कहना ग़लत होगा। यह वास्तव में एक कमज़ोर और अपर्याप्त रूप से
तैयार यांत्रिक भौतिकवाद पर सुसंगत भाववाद की जीत भर है—न कि भौतिकवाद पर भाववाद
की।
यहाँ यह बात भी
स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि हम नास्तिकता को अपने-आप में और अपने-आप के लिए
ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील नहीं मानते। हम यह नहीं मानते कि केवल नास्तिक होना ही
किसी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील बना देता है। हमारी
प्रगतिशीलता की एकमात्र कसौटी सत्य के प्रति हमारी प्रतिबद्धता है और यह कि हम
उत्पीड़कों के साथ खड़े हैं या उत्पीड़ितों के साथ। यदि केवल नास्तिक होना ही किसी
को प्रगतिशील बना देता, तो सावरकर और जिन्ना भी प्रगतिशील कहलाते! यदि नास्तिकता का
अर्थ ही प्रगतिशीलता होता, तो नव नास्तिकतावाद (न्यू एथीज़्म) के ‘चार घुड़सवारों’ में
से एक क्रिस्टोफ़र हिचेन्स—जिन्होंने इराक पर अमेरिकी आक्रमण का समर्थन किया—और
केरल के तर्कणावादी समूह एसेसन्स ग्लोबल (esSENCE Global), जो इज़रायल का समर्थन करता
है, उन्हें भी
प्रगतिशील मानना पड़ता!
लल्लनटॉप से एक
अपील
यह लेख
साइण्टिस्ट्स फ़ॉर सोसाइटी द्वारा लल्लनटॉप के मंच पर हाल ही में आयोजित ‘क्या
ईश्वर का अस्तित्व है?’ विषयक बहस में एक हस्तक्षेप के रूप में लिखा गया है।
साइण्टिस्ट्स फ़ॉर सोसाइटी समाज के प्रति प्रतिबद्ध वैज्ञानिकों, प्रोफ़ेसरों और
छात्रों का एक मंच है, जो आम जनता के बीच और आम जनता के लिए विज्ञान तथा वैज्ञानिक
दृष्टिकोण की रक्षा और प्रचार के लिए संकल्पबद्ध है। इसी कारण हमें आशा है कि
लल्लनटॉप बहस के लोकतांत्रिक सिद्धान्तों का पालन करेगा, हमारे इस हस्तक्षेप को अपने
मंचों पर प्रकाशित करेगा और इसे बहस के दोनों प्रतिभागियों तक पहुँचायेगा। हमें यह
भी पूरा विश्वास है कि यह लेख विभिन्न अनौपचारिक माध्यमों से मुफ़्ती शमाइल और
जावेद अख़्तर तक अवश्य पहुँचेगा। पूर्ण विनम्रता के साथ, हम दोनों को उनके समय और
सुविधा के अनुसार किसी भी स्थान पर इस विषय पर एक खुली बहस के लिए आमंत्रित करते
हैं। हमें यह भी विश्वास है कि अपने-अपने विचारों में दृढ़ आस्था रखने वाले
लोकतांत्रिक सार्वजनिक बुद्धिजीवी होने के नाते, वे इस लेख का उत्तर देने से
पीछे नहीं हटेंगे। कम से कम इतना तो हम मुफ़्ती शमाइल और जावेद अख़्तर से अपेक्षा
कर ही सकते हैं।

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